Farhat Abbas Shah

Farhat Abbas Shah

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Farhat Abbas Shah shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Farhat Abbas Shah's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ये झाँक लेती है दिल से जो दूसरे दिल में मेरी निगाह में सारा कमाल दर्द का है — Farhat Abbas Shah
बदल गए मेरे मौसम तो यार अब आए ग़मों ने चाट लिया ग़म-गुसार अब आए — Farhat Abbas Shah
दर्द सहने का अलग अंदाज़ है जी रहे हैं हम अदा की ज़िंदगी — Farhat Abbas Shah
बस एक लम्हे के सच झूट के एवज़ 'फ़रहत' तमाम उम्र का इल्ज़ाम ले गया मुझ से — Farhat Abbas Shah
उसे ज़ियादा ज़रूरत थी घर बसाने की वो आ के मेरे दर-ओ-बाम ले गया मुझ से — Farhat Abbas Shah
उस के बारे में बहुत सोचता हूँ मुझ से बिछड़ा तो किधर जाएगा — Farhat Abbas Shah
मैं शा'इर हूँ मोहब्बत का मिरे दुख भी रसीले हैं — Farhat Abbas Shah
आती है परेशानी तो आता है ख़ुदा याद वर्ना नहीं दुनिया में कोई तेरे सिवा याद — Farhat Abbas Shah
तू है सूरज तुझे मालूम कहाँ रात का दुख तू किसी रोज़ मेरे घर में उतर शाम के बा'द — Farhat Abbas Shah
मैं बे-ख़याल कभी धूप में निकल आऊँ तो कुछ सहाब मिरे साथ साथ चलते हैं — Farhat Abbas Shah
कभी सहर तो कभी शाम ले गया मुझ से तुम्हारा दर्द कई काम ले गया मुझ से — Farhat Abbas Shah

Ghazal

तू ने देखा है कभी एक नज़र शाम के बा'द कितने चुप-चाप से लगते हैं शजर शाम के बा'द इतने चुप-चाप कि रस्ते भी रहेंगे ला-इल्म छोड़ जाएँगे किसी रोज़ नगर शाम के बा'द मैं ने ऐसे ही गुनह तेरी जुदाई में किए जैसे तूफ़ाँ में कोई छोड़ दे घर शाम के बा'द शाम से पहले वो मस्त अपनी उड़ानों में रहा जिस के हाथों में थे टूटे हुए पर शाम के बा'द रात बीती तो गिने आबले और फिर सोचा कौन था बाइस-ए-आग़ाज़-ए-सफ़र शाम के बा'द तू है सूरज तुझे मा'लूम कहाँ रात का दुख तू किसी रोज़ मेरे घर में उतर शाम के बा'द लौट आए न किसी रोज़ वो आवारा-मिज़ाज खोल रखते हैं इसी आस पे दर शाम के बा'द — Farhat Abbas Shah
तू अपने होने का हर इक निशाँ सँभाल के मिल यक़ीं सँभाल के मिल और गुमाँ सँभाल के मिल हम अपने बारे कभी मुश्तइ'ल नहीं होते फ़क़ीर लोग हैं हम से ज़बाँ सँभाल के मिल वजूद-ए-वाहिमा वीरानियों में घूमता है ये बे-कराँ है तो फिर बे-कराँ सँभाल के मिल ये मरहले हैं अजब इस लिए समुंदर से हुआ को थाम के मिल बादबाँ सँभाल के मिल अगरचे दोस्त हैं सारे ही आस-पास मगर उसूल ये है कि तीर-ओ-कमाँ सँभाल के मिल तू कैसी ग़ैर-यक़ीनी फ़ज़ा में मिलता है कोई तो लम्हा कभी दरमियाँ सँभाल के मिल फिर उस के बा'द तो शायद रहे रहे न रहे तमाम उम्र का सूद-ओ-ज़ियाँ सँभाल के मिल — Farhat Abbas Shah
इसी से होता है ज़ाहिर जो हाल दर्द का है सभी को कोई न कोई वबाल दर्द का है सहर सिसकते हुए आसमान से उतरी तो दिल ने जान लिया ये भी साल दर्द का है ये झाँक लेती है दिल से जो दूसरे दिल में मेरी निगाह में सारा कमाल दर्द का है अब इस के बा'द कोई राब्ता नहीं रखना ये बात तय हुई लेकिन सवाल दर्द का है ये दिल ये उजड़ी हुई चश्म-ए-नम ये तन्हाई हमारे पास तो जो भी है माल दर्द का है न तुम में सुख की कोई बात है न मुझ में है तुम्हारा और मेरा मिलना विसाल दर्द का है किसी ने पूछा के 'फ़रहत' बहुत हसीन हो तुम तो मुस्कुरा के कहा सब जमाल दर्द का है — Farhat Abbas Shah