Alam Khursheed

Alam Khursheed

@alam-khursheed

Alam Khursheed shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Alam Khursheed's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

4

Content

53

Likes

107

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal

Sher

किसी को ढूँडते हैं हम किसी के पैकर में किसी का चेहरा किसी से मिलाते रहते हैं — Alam Khursheed
कभी कभी कितना नुक़सान उठाना पड़ता है ऐरों ग़ैरों का एहसान उठाना पड़ता है — Alam Khursheed
तब्दीलियों का नश्शा मुझ पर चढ़ा हुआ है कपड़े बदल रहा हूँ चेहरा बदल रहा हूँ — Alam Khursheed
हाथ पकड़ ले अब भी तेरा हो सकता हूँ मैं भीड़ बहुत है इस मेले में खो सकता हूँ मैं — Alam Khursheed
पूछ रहे हैं मुझ सेे पेड़ों के सौदागर आब-ओ-हवा कैसे ज़हरीली हो जाती है — Alam Khursheed

Ghazal

कोई मौसम न कभी कर सका शादाब हमें शहर में जीने के आए नहीं आदाब हमें बहते दरिया में कोई अक्स ठहरता ही नहीं याद आता है बहुत गाँव का तालाब हमें इस तरह प्यास बुझाई है कहाँ दरिया ने एक क़तरे ने किया जिस तरह सैराब हमें झिलमिली रौशनी हर-सम्त नज़र आती है खींचती है कोई क़िंदील तह-ए-आब हमें क्या पता कौन से जन्मों का है रिश्ता अपना ढूँड ही लेते हैं हर बहर में गिर्दाब हमें दिन उलट देता है हर ख़्वाब की ता'बीर मगर रात दिखलाती है फिर कोई नया ख़्वाब हमें बे-अमाँ हम जो हुए हैं तो हमें याद आया रोज़ देते थे सदा मिम्बर-ओ-मेहराब हमें काश मा'लूम ये पहले हमें होता 'आलम' देखना चाहता था वो भी ज़फ़र-याब हमें — Alam Khursheed
आलम' जीवन खेल-तमाशा दानाई नादानी है तब तक ज़िंदा रहते हैं हम जब तक इक हैरानी है आग हवा और मिट्टी पानी मिल कर कैसे रहते हैं देख के ख़ुद को हैराँ हूँ मैं जैसे ख़्वाब कहानी है आवाज़ों का जंगल भी है सन्नाटों का सहरा भी एक तरफ़ आबादी मुझ में एक तरफ़ वीरानी है इस मंज़र को आख़िर क्यूँँ मैं पहरों तकता रहता हूँ ऊपर साकित चट्टानें हैं तह में बहता पानी है मेरे बच्चो इस ख़ित्ते में प्यार की गंगा बहती थी देखो इस तस्वीर को देखो ये तस्वीर पुरानी है 'आलम' मुझ को बीमारी है नींद में चलते रहने की रातों में भी कब रुकता है मुझ में जो सैलानी है — Alam Khursheed
बह रहा था एक दरिया ख़्वाब में रह गया मैं फिर भी तिश्ना ख़्वाब में जी रहा हूँ और दुनिया में मगर देखता हूँ और दुनिया ख़्वाब में इस ज़मीं पर तू नज़र आता नहीं बस गया है जो सरापा ख़्वाब में रोज़ आता है मिरा ग़म बाँटने आसमाँ से इक सितारा ख़्वाब में मुद्दतों से दिल है उस का मुंतज़िर कोई वा'दा कर गया था ख़्वाब में क्या यक़ीं आ जाएगा उस शख़्स को उस की बाबत जो भी देखा ख़्वाब में एक बस्ती है जहाँ ख़ुश हैं सभी देख लेता हूँ मैं क्या क्या ख़्वाब में अस्ल दुनिया में तमाशे कम हैं क्या क्यूँँ नज़र आए तमाशा ख़्वाब में खोल कर आँखें पशेमाँ हूँ बहुत खो गया जो कुछ मिला था ख़्वाब में क्या हुआ है मुझ को 'आलम' इन दिनों मैं ग़ज़ल कहता नहीं था ख़्वाब में — Alam Khursheed
ज़वाल में भी रहा दिल-नशीं नज़ारा मिरा मिरे ही साथ गिरा टूट के सितारा मिरा किसी पे रम्ज़ मिरी बात की खुली ही नहीं न काम आया मिरे कोई इस्तिआ'रा मिरा यक़ीं किसी को न आया मैं डूब सकता हूँ समझ रहे थे अगरचे सभी इशारा मिरा नदी की तरह किनारा भी काटता हूँ मैं किसी हिसार में होता नहीं गुज़ारा मिरा ये बात जान के हैरत नहीं हुई मुझ को कि मेरी आग से रौशन रहा सितारा मिरा न रोक पाई मुझे मौजों की कोई साज़िश रवाँ-दवाँ है अभी झील में शिकारा मिरा अभी से सम्त बदलने लगा मैं क्यूँँ 'आलम' अभी तो दूर बहुत दूर है किनारा मिरा — Alam Khursheed
हिरासाँ हूँ सियाही में कमी होती नहीं है चराग़ाँ कर रहा हूँ रौशनी होती नहीं है बहुत चाहा कि आँखें बंद कर के मैं भी जी लूँ मगर मुझ से बसर यूँँ ज़िंदगी होती नहीं है लहू का एक इक क़तरा पिलाता जा रहा हूँ अगरचे ख़ाक में पैदा नमी होती नहीं है दरीचों को खुला रखता हूँ मैं हर-वक़्त लेकिन हवा में पहले जैसी ताज़गी होती नहीं है मैं रिश्वत के मसाइल पर नमाज़ें पढ़ न पाया बदी के साथ मुझ से बंदगी होती नहीं है मैं अपने अहद की तस्वीर हर-पल खींचता हूँ ग़लत है सोचना ये शाइ'री होती नहीं है बुरा है दुश्मनी से आश्ना होना भी 'आलम' किसी से अब हमारी दोस्ती होती नहीं है — Alam Khursheed
कभी कभी कितना नुक़सान उठाना पड़ता है ऐरों ग़ैरों का एहसान उठाना पड़ता है टेढ़े-मेढ़े रस्तों पर भी ख़्वाबों का पश्तारा तेरी ख़ातिर मेरी जान उठाना पड़ता है कब सुनता है नाला कोई शोर-शराबे में मजबूरी में भी तूफ़ान उठाना पड़ता है कैसी हवाएँ चलने लगी हैं मेरे बाग़ों में फूलों को भी अब सामान उठाना पड़ता है गुल-दस्ते की ख़्वाहिश रखने वालों को अक्सर कोई ख़ार भरा गुल-दान उठाना पड़ता है याँ कोई तफ़रीक़ नहीं है शाह गदा सब को अपना बोझ दिल-ए-नादान उठाना पड़ता है यूँँ मायूस नहीं होते हैं कोई न कोई ग़म अच्छे अच्छों को हर आन उठाना पड़ता है मक्कारों की इस दुनिया में कभी कभी 'आलम' अच्छे लोगों को बोहतान उठाना पड़ता है — Alam Khursheed
दिल बदलने से न अफ़्लाक बदल जाने से शहर बदला मिरी पोशाक बदल जाने से किस क़दर हो गई आसान हमारी मुश्किल एक पैमाना-ए-इदराक बदल जाने से आज भी रक़्स ही करना है इशारों पे हमें फ़ाएदा कुछ न हुआ चाक बदल जाने से रास्ता अब भी वही है मिरी मंज़िल भी वही तेज़-रौ मैं हुआ पेचाक बदल जाने से भीड़ बढ़ने लगी है मेरे बही-ख़्वाहों की इक ज़रा सूरत-ए-नमनाक बदल जाने से नींद आती थी बहुत फ़र्श-ए-ज़मीं पर मुझ को ख़्वाब रूठे मिरी इम्लाक बदल जाने से बे-वतन मैं हूँ मगर ख़ुश हैं मिरे घर वाले इतना हासिल तो हुआ ख़ाक बदल जाने से बदली बदली सी नज़र आती है दुनिया 'आलम' बस मिज़ाज-ए-ख़स-ओ-ख़ाशाक बदल जाने से — Alam Khursheed
जमा हुआ है फ़लक पे कितना ग़ुबार मेरा जो मुझ पे होता नहीं है राज़ आश्कार मेरा तमाम दुनिया सिमट न जाए मिरी हदों में कि हद से बढ़ने लगा है अब इंतिशार मेरा धुआँ सा उठता है किस जगह से मैं जानता हूँ जलाता रहता है मुझ को हर पल शरार मेरा बदल रहे हैं सभी सितारे मदार अपना मिरे जुनूँ पे टिका है दार-ओ-मदार मेरा किसी के रस्ते पे कैसे नज़रें जमाए रक्खूँ अभी तो करना मुझे है ख़ुद इंतिज़ार मेरा तिरी इता'अत क़ुबूल कर लूँ भला मैं कैसे कि मुझ पे चलता नहीं है ख़ुद इख़्तियार मेरा बस एक पल में किसी समुंदर में जा गिरूँगा अभी सितारों में हो रहा है शुमार मेरा — Alam Khursheed