Ahmad Azeem

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@ahmad-azeem

Ahmad Azeem shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ahmad Azeem's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Ghazal

यहाँ पे ढूँडे से भी फ़रिश्ते नहीं मिलेंगे ज़मीं है साहब यहाँ तो अहल-ए-ज़मीं मिलेंगे परेशाँ मत हो कि यार टेढ़ी लकीरें हैं हम कहाँ का तो कुछ पता नहीं पर कहीं मिलेंगे कुछ ऐसे ग़म हैं जो दिल में हरगिज़ नहीं ठहरते मकान होते हुए सड़क पर मकीं मिलेंगे ज़मीं पे मिलने न देंगे हम को ज़माने वाले चलो कि मरते हैं दोनों ज़ेर-ए-ज़मीं मिलेंगे हमारे दिल में बनी हुई हैं हज़ारों क़ब्रें हर एक तुर्बत में दफ़्न ज़िंदा यक़ीं मिलेंगे रखा गया है हमें कुछ ऐसे मुग़ालते में वहाँ मिलेंगे जहाँ पे अर्श-ओ-ज़मीं मिलेंगे हमें तो हूरें मिलेंगी हम से बना के रक्खो तुम्हें वहाँ पर भी जा के केवल हमीं मिलेंगे — Ahmad Azeem
दुश्मनों की कभी फ़िहरिस्त बढ़ाता नहीं मैं इश्क़ किस से है किसी को भी बताता नहीं मैं उस ने इस तरह पुकारा कि पलटना ही पड़ा वर्ना इक बार चला जाऊँ तो आता नहीं मैं तेरी क़िस्मत कि तू इस दिल में रहा करता है ये वो मसनद है जहाँ सब को बिठाता नहीं मैं मेरे सय्याद मुझे अब तो रिहा मत करना तेरे दाने के सिवा कुछ भी तो खाता नहीं मैं जो भी होता है वो अच्छे के लिए होता है इस लिए ज़ख़्म पे मरहम भी लगाता नहीं मैं अपनी मर्ज़ी से चलाता हूँ घड़ी को अपनी वक़्त अपना कभी औरों से मिलाता नहीं मैं इतना सादा है कि ख़त भी नहीं लिखना आता उस के ख़त घर में किसी से भी छुपाता नहीं मैं मुझ को शाइ'र कभी तस्लीम करेगी दुनिया शे'र कहता हूँ मगर पीता पिलाता नहीं मैं — Ahmad Azeem
सिफ़ारिशों के बजाए हुनर से जाना गया परिंदा पेड़ नहीं बाल-ओ-पर से जाना गया किसी का होना किसी की नज़र से जाना गया मिरा मकान तिरी रहगुज़र से जाना गया मुझे मिलाया था इक रोज़ तुम ने मिट्टी में नतीजा ये हुआ मैं फिर शजर से जाना गया जहाँ पे बोलते रहना दलील इल्म की थी वहाँ मैं गुफ़्तुगू-ए-मुख़्तसर से जाना गया मैं इस किताब के इक बाब का हूँ इक किरदार वो जिस किताब को केवल कवर से जाना गया वगर्ना इश्क़ की गलियाँ तवील होती हैं मिरा नसीब मैं पहले ही घर से जाना गया अदब में 'मीर' का क़श्क़ा ही थोड़ी है मशहूर हमारा सर भी तिरी ख़ाक-ए-दर से जाना गया मैं तन्हा करता रहा मुद्दतों ग़ज़ल का सफ़र और आख़िरश ये सफ़र हम-सफ़र से जाना गया — Ahmad Azeem
हुस्न-परी हो साथ और बे-मौसम की बारिश हो जाए छतरी कौन ख़रीदेगा फिर जितनी बारिश हो जाए ऐसी प्यास की शिद्दत है कि मैं ये दुआएँ करता हूँ जितने समुंदर हैं दुनिया में सब की बारिश हो जाए मेरी ग़ज़लें उस के साथ बिताए वक़्त का हासिल हैं वैसी फ़स्लें उग आती हैं जैसी बारिश हो जाए छोटे छोटे तालाबों से पानी छीना जाता है तुम तो बस ये कह देते हो थोड़ी बारिश हो जाए आँधी आए बिजली कड़के काली घटाएँ छाने लगें मजबूरन वो रुके मिरे घर इतनी बारिश हो जाए तंग आया हूँ मैं इस हिज्र-ओ-वस्ल की बूँदा-बाँदी से या तो सूखा पड़ जाए या ढंग की बारिश हो जाए — Ahmad Azeem