Fahmida Riaz

Top 10 of Fahmida Riaz

    उस को इक दिन तो जाना था
    मुझ से क्या रिश्ता क्या नाता
    बस पल-दो-पल को ठहरा था
    पल-दो-पल हँसते गुज़रा था

    मैं तब भी सोचा करती थी
    ये साथ बड़ा लम्हाती है
    जज़्बे की थोड़ी सी गर्मी
    जलते छाले बन जाती है

    इस बात को बीते साल हुए
    फिर दुनिया है पहले जैसी
    सब रंग वही रा'नाई वही
    सब हुस्न वही पर क्या कीजे
    सच्चे थे मिरे सब अंदेशे
    अब भी यूँ ही बैठे-बैठे
    याद आए तो दिल दुख जाता है
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    ये जो तन्हाई है शायद मिरी तन्हाई न हो
    गूँजना हो न समाअ'त में सुकूत
    और शब-ओ-रोज़ की ना'श
    मेरी दहलीज़ पे अय्याम ने दफ़नाई न हो
    अनगिनत फूल ही खिलते हों
    इक शजर मोलरी का हो कहीं जिस के तले
    यार अग़्यार गले मिलते हों
    आन पहुँचे हों ख़ुशी के मौसम
    राह तकते हों मिरी
    और मुझ तक किसी बाइ'से ये ख़बर आई न हो
    हो के ख़ुश हँसते हुए अहबाब तमाम
    भेजते हों मुझे कब से पैग़ाम
    ढूँडते हों मुझे बेताबाना
    राह तकते हों मिरी
    और मुझ तक किसी बाइ'से ये ख़बर आई न हो
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    आसमाँ तपते हुए लोहे की मानिंद सफ़ेद
    रेग सूखी हुई प्यासे की ज़बाँ की मानिंद
    प्यास हुल्क़ूम में है जिस्म में है जान में है

    सर-ब-ज़ानू हूँ झुलसते हुए रेगिस्ताँ में
    तेरी सरकार में ले आई हूँ ये वहश ज़बीह!
    मुझ पे लाज़िम थी जो क़ुर्बानी वो मैं ने कर दी

    उस की उबली हुई आँखों में अभी तक है चमक
    और सियह-बाल हैं भीगे हुए ख़ूँ से अब तक
    तेरा फ़रमान ये था उस पे कोई दाग़ न हो
    सो ये बे-ऐब अछूता भी था अन-देखा भी
    बे-कराँ रेग में सब गर्म लहू जज़्ब हुआ
    देख चादर पे मिरी सब्त है उस का धब्बा
    ऐ ख़ुदा-वंद-ए-कबीर
    जब्बार!
    मुतकब्बिरजलील!
    हाँ तिरे नाम पढ़े और किया ज़ब्ह उसे
    अब कोई पारा-ए-अब्र आए कहीं साया हो
    ऐ ख़ुदा-वंद-ए-अज़ीम
    बाद-ए-तस्कीं! के नफ़स आग बना जाता है!
    क़तरा-ए-आब कि जाँ लब पे चली आई है
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    सनसनाहटों के साथ
    गड़गड़ाहटो के साथ
    आ गया!
    पवन-रथ पे बैठ कर
    मेरा मेघ देवता
    दोश पर हवाओं के
    बाल उड़ाता हुआ
    उस का जामुनी बदन
    आसमाँ पे छा गया
    दूर तक गरज हुई
    ज़मीं दहलने लगी
    आसमाँ सिमट गया
    बड़ी घन-गरज के साथ
    टूट कर बरस पड़ा
    और मैं आँख मूँद कर
    हाथ पसारे हुए
    दौड़ती चली गई
    अंग से लगा रही
    नील उस के अंग का

    मैं कि बिंत-ए-जिज्र हूँ
    मुझ में ऐसी प्यास है
    मैं कि मेरे वास्ते
    वस्ल भी फ़िराक़ है
    मुझ में ऐसी आग है
    मेघ-रस में भीग कर
    हाँफती खड़ी खड़ी
    कह रहा है दिल मेरा
    यही है
    मधुर मिलन की घड़ी
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    तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
    अब तक कहाँ छुपे थे भाई
    वो मूरखता वो घामड़-पन
    जिस में हम ने सदी गँवाई
    आख़िर पहुँची द्वार तुहारे
    अरे बधाई बहुत बधाई
    प्रीत धर्म का नाच रहा है
    क़ाएम हिन्दू राज करोगे
    सारे उल्टे काज करोगे
    अपना चमन ताराज करोगे
    तुम भी बैठे करोगे सोचा
    पूरी है वैसी तय्यारी
    कौन है हिन्दू कौन नहीं है
    तुम भी करोगे फ़तवा जारी
    होगा कठिन यहाँ भी जीना
    दाँतों आ जाएगा पसीना
    जैसी-तैसी कटा करेगी
    यहाँ भी सब की साँस घुटेगी
    भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा
    अब जाहिल-पन के गन गाना
    आगे गढ़ा है ये मत देखो
    वापस लाओ गया ज़माना
    मश्क़ करो तुम आ जाएगा
    उल्टे पाँव चलते जाना
    ध्यान न दूजा मन में आए
    बस पीछे ही नज़र जमाना
    एक जाप सा करते जाओ
    बारम-बार यही दोहराओ
    कैसा वीर महान था भारत
    कितना आली-शान था भारत
    फिर तुम लोग पहुँच जाओगे
    बस परलोक पहुँच जाओगे
    हम तो हैं पहले से वहाँ पर
    तुम भी समय निकालते रहना
    अब जिस नर्क में जाओ वहाँ से
    चिट्ठी-विट्ठी डालते रहना
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    बैठा है मेरे सामने वो
    जाने किसी सोच में पड़ा है
    अच्छी आँखें मिली हैं उस को
    वहशत करना भी आ गया है
    बिछ जाऊँ मैं उस के रास्ते में
    फिर भी क्या इस से फ़ाएदा है
    हम दोनों ही ये तो जानते हैं
    वो मेरे लिए नहीं बना है
    मेरे लिए उस के हाथ काफ़ी
    उस के लिए सारा फ़ल्सफ़ा है
    मेरी नज़रों से है परेशाँ
    ख़ुद अपनी कशिश से ही ख़फ़ा है
    सब बात समझ रहा है लेकिन
    गुम-सुम सा मुझ को देखता है
    जैसे मेले में कोई बच्चा
    अपनी माँ से बिछड़ गया है
    उस के सीने में छुप के रोऊँ
    मेरा दिल तो ये चाहता है
    कैसा ख़ुश-रंग फूल है वो
    जो उस के लबों पे खिल रहा है
    या रब वो मुझे कभी न भूले
    मेरी तुझ से यही दुआ है
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    अब सो जाओ
    और अपने हाथ को मेरे हाथ में रहने दो
    तुम चाँद से माथे वाले हो
    और अच्छी क़िस्मत रखते हो
    बच्चे की सौ भोली सूरत
    अब तक ज़िद करने की आदत
    कुछ खोई खोई सी बातें
    कुछ सीने में चुभती यादें
    अब इन्हें भुला दो सो जाओ
    और अपने हाथ को मेरे हाथ में रहने दो
    सो जाओ तुम शहज़ादे हो
    और कितने ढेरों प्यारे हो
    अच्छा तो कोई और भी थी
    अच्छा फिर बात कहाँ निकली
    कुछ और भी यादें बचपन की
    कुछ अपने घर के आँगन की
    सब बतला दो फिर सो जाओ
    और अपने हाथ को मेरे हाथ में रहने दो
    ये ठंडी साँस हवाओं की
    ये झिलमिल करती ख़ामोशी
    ये ढलती रात सितारों की
    बीते न कभी तुम सो जाओ
    और अपने हाथ को मेरे हाथ में रहने दो
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    ये किस के आँसुओं ने उस नक़्श को मिटाया
    जो मेरे लौह-ए-दिल पर तू ने कभी बनाया

    था दिल जब उस पे माइल था शौक़ सख़्त मुश्किल
    तर्ग़ीब ने उसे भी आसान कर दिखाया

    इक गर्द-बाद में तू ओझल हुआ नज़र से
    इस दश्त-ए-बे-समर से जुज़ ख़ाक कुछ न पाया

    चोब-ए-ख़ुश्क-ए-सहरा वो बाद-ए-शौक़ क्या थी
    मेरी तरह बरहना जिस ने तुझे बनाया

    फिर हम हैं नीम-शब है अंदेशा-ए-अबस है
    वो वाहिमा कि जिस से तेरा यक़ीन आया
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    पत्थर से विसाल माँगती हूँ
    मैं आदमियों से कट गई हूँ

    शायद पाऊँ सुराग़-ए-उल्फ़त
    मुट्ठी में ख़ाक-भर रही हूँ

    हर लम्स है जब तपिश से आरी
    किस आँच से यूँ पिघल रही हूँ

    वो ख़्वाहिश-ए-बोसा भी नहीं अब
    हैरत से होंट काटती हूँ

    इक तिफ़्लक-ए-जुस्तुजू हूँ शायद
    मैं अपने बदन से खेलती हूँ

    अब तब्अ' किसी पे क्यूँ हो राग़िब
    इंसानों को बरत चुकी हूँ
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    Fahmida Riaz
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    ये पैरहन जो मेरी रूह का उतर न सका
    तो नख़-ब-नख़ कहीं पैवस्त रेशा-ए-दिल था

    मुझे मआल-ए-सफ़र का मलाल क्यूँकर हो
    कि जब सफ़र ही मेरा फ़ासलों का धोका था

    मैं जब फ़िराक़ की रातों में उस के साथ रही
    वो फिर विसाल के लम्हों में क्यूँ अकेला था

    वो वास्ते की तेरा दरमियाँ भी क्यूँ आए
    ख़ुदा के साथ मेरा जिस्म क्यूँ न हो तन्हा

    सराब हूँ मैं तेरी प्यास क्या बुझाऊँगी
    इस इश्तियाक़ से तिश्ना ज़बाँ क़रीब न ला

    सराब हूँ कि बदन की यही शहादत है
    हर एक उज़्व में बहता है रेत का दरिया

    जो मेरे लब पे है शायद वही सदाक़त है
    जो मेरे दिल में है उस हर्फ़-ए-राएगाँ पे न जा

    जिसे मैं तोड़ चुकी हूँ वो रौशनी का तिलिस्म
    शुआ-ए-नूर-ए-अज़ल के सिवा कुछ और न था
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