हवाएँ तेज़ थीं ये तो फ़क़त बहाने थे
    सफ़ीने यूँ भी किनारे पे कब लगाने थे

    ख़याल आता है रह रह के लौट जाने का
    सफ़र से पहले हमें अपने घर जलाने थे

    गुमान था कि समझ लेंगे मौसमों का मिज़ाज
    खुली जो आँख तो ज़द पे सभी ठिकाने थे

    हमें भी आज ही करना था इंतिज़ार उस का
    उसे भी आज ही सब वादे भूल जाने थे

    तलाश जिन को हमेशा बुज़ुर्ग करते रहे
    न जाने कौन सी दुनिया में वो ख़ज़ाने थे

    चलन था सब के ग़मों में शरीक रहने का
    अजीब दिन थे अजब सर-फिरे ज़माने थे
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    Aashufta Changezi
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    धुआँ उठ रहा है
    उफ़ुक़ से धुआँ उठ रहा है
    समुंदर की साँसें उखड़ने लगी हैं
    बहुत धीमी धुन पर
    कोई माहिया गा रहा है
    हरकत हरकत हरकत हरकत
    क़ुआ शल हुए जा रहे हैं
    अचानक वो आबी परिंदों को उड़ता हुआ देखते हैं
    सभी चीख़ते हैं

    तू सुल्तान साहिब सरीर आमदी
    अला कुल्ले शयइन क़ादीर आमदी

    कलीसा शिवाले मुक़द्दस नदी
    अज़ाँ की फुवारों से सारा बदन भीगता है
    कोई आँखें फाड़े हुए
    कह रहा है
    कि वो धुँद के उस तरफ़
    रौशनी रौशनी रौशनी रौशनी

    सभी चीख़ते हैं
    सराए में ताला पड़ा है!
    उफ़ुक़ से धुआँ उठ रहा है!!
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    Aashufta Changezi
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    सहीह कह रहे हो
    शिकायत बजा है तुम्हारी
    घने गर्द चेहरे तुम्हारे नहीं हैं

    ख़िज़ाँ-ज़ादे शहरों का रुख़ कर रहे हैं
    गुलाबी हरे नीले पीले
    सभी रंग मौसम उड़ा ले गया है
    कोई धानी चुनरी
    हवा से नहीं खेलती है
    कहानी सुनाओ किसी वक़्त भी
    कि दिन रात की क़ैद बाक़ी नहीं है
    सुना है
    मुसाफ़िर कोई रास्ता अब नहीं भूलता

    सही कह रहे हो
    कि ये मसअला भी तुम्हारा नहीं है
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    Aashufta Changezi
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    वही क़िस्सा-गो
    जो इक रोज़ क़िस्सा सुनाते सुनाते
    किसी प्यास को याद करता हुआ,
    उठ गया था
    फिर इक रोज़ लोगों से ये भी सुना था
    कि वो,
    प्यास ही प्यास की रट लगाता हुआ
    इक कुएँ में गिरा था

    इधर कुछ दिनों से
    ये अफ़्वाह गर्दिश में है
    कि वो क़िस्सा-गो
    जिसे भी दिखाई दिया है
    वो बस!
    प्यास ही प्यास की रट लगाता हुआ
    कुएँ की तरफ़ जा रहा है
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    Aashufta Changezi
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    अज़िय्यत और इस सुकूँ
    दोनों को ही दिल खोल के मैं ने लुटाया है
    हज़ारों बार ऐसा भी हुआ है
    दोस्तों की रहनुमाई में
    फिरा हूँ मारा मारा
    शहर की आबाद सड़कों पर
    कभी वीरान गलियों में
    कभी सहराओं की भी ख़ाक छानी है

    मगर इस बार जाने क्या हुआ मुझ को
    नुमाइश की दुकानों में
    सजा कर ख़ुद को घर वापस चला आया
    अभी दरवाज़ा मैं ने खटखटाया था
    कि घर वालों ने कीना-तूज़ नज़रों से मुझे देखा
    जब उन की आँखों में,
    कोई रमक़ पहचान की मैं ने नहीं पाई
    तो उल्टे पैरों वापस लौट आया हूँ

    और अब ये सोचता हूँ
    दोस्तों की रहनुमाई में
    उन्हीं गलियों में सहराओं में जा कर
    अपने क़दमों के निशाँ ढूँडूँ
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    Aashufta Changezi
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    आज उन्हों ने ऐलान कर ही दिया
    देखो!
    हम ने तुम्हारी सब की सब क़ुव्वतों का फ़ैसला किया था
    क़ील-ओ-क़ाल की गुंजाइश बाक़ी नहीं है
    तुम्हारे इक़रार-नामे हमारे पास महफ़ूज़ हैं
    तुम से पहले वालों की ख़ता यही थी
    कि उन्हें,
    अपनी नाफ़ के नीचे सरसराहट का एहसास
    कुछ ज़ियादा ही हो चला था
    उन्हें शहर-बदर कर दिया गया
    उन के पछतावे और गिड़गिड़ाहटें
    आज भी हमारे कानों में महफ़ूज़ हैं
    तुम्हें इतनी छूट दी ही क्यूँ जाए
    कि तुम
    कल हमारे मुक़ाबले पर उतर आओ
    हम तुम्हें होशियार किए देते हैं
    दीवारें फलांगने वाले
    इताब से बच नहीं सकते
    अक़्द-नामों पर तुम्हारे दस्तख़त
    तुम्हारी ना-मुरादी का खुला ए'तिराफ़ हैं
    इस के बग़ैर
    हमारी हरम-सरा में
    दाख़िल होने के इजाज़त-नामे
    तुम्हें मिल भी कैसे सकते थे
    इस से पहले कि हमारे नजीबुत-तरफ़ैन शजरे मश्कूक हो जाएँ
    और हमारे हसब-नसब पर आँच आ जाए
    हम!
    तुम से पहले गुलू-ख़लासी का रास्ता ढूँड निकालेंगे!!
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    Aashufta Changezi
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    सारे दिन की थकी,
    वीरान और बे-मसरफ़ रात को
    एक अजीब मश्ग़ला हाथ आ गया है
    अब वो!
    सारे शहर की आवारा परछाइयों को
    जिस्म देने की कोशिश में मसरूफ़ है
    मुझे मालूम है
    अगर गुम-नाम परछाइयों को
    उन की पहचान मिल गई
    तो शहर के मुअज़्ज़ज़ और इबादत-गुज़ार शरीफ़-ज़ादे
    हम-शक्ल परछाइयों के ख़ौफ़ से
    परछाइयों में तब्दील हो जाएँगे
    और
    बे-मसरफ़ दिन भर की थकी हुई रात को
    एक और मश्ग़ला मिल जाएगा
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    Aashufta Changezi
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    हमें भी आज ही करना था इंतिज़ार उस का
    उसे भी आज ही सब वादे भूल जाने थे
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    गुज़र गए हैं जो मौसम कभी न आएँगे
    तमाम दरिया किसी रोज़ डूब जाएँगे

    सफ़र तो पहले भी कितने किए मगर इस बार
    ये लग रहा है कि तुझ को भी भूल जाएँगे

    अलाव ठंडे हैं लोगों ने जागना छोड़ा
    कहानी साथ है लेकिन किसे सुनाएँगे

    सुना है आगे कहीं सम्तें बाँटी जाती हैं
    तुम अपनी राह चुनो साथ चल न पाएँगे

    दुआएँ लोरियाँ माओं के पास छोड़ आए
    बस एक नींद बची है ख़रीद लाएँगे

    ज़रूर तुझ सा भी होगा कोई ज़माने में
    कहाँ तलक तिरी यादों से जी लगाएँगे
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    Aashufta Changezi
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    सभी को अपना समझता हूँ क्या हुआ है मुझे
    बिछड़ के तुझ से अजब रोग लग गया है मुझे

    जो मुड़ के देखा तो हो जाएगा बदन पत्थर
    कहानियों में सुना था सो भोगना है मुझे

    मैं तुझ को भूल न पाया यही ग़नीमत है
    यहाँ तो इस का भी इम्कान लग रहा है मुझे

    मैं सर्द जंग की आदत न डाल पाऊँगा
    कोई महाज़ पे वापस बुला रहा है मुझे

    सड़क पे चलते हुए आँखें बंद रखता हूँ
    तिरे जमाल का ऐसा मज़ा पड़ा है मुझे

    अभी तलक तो कोई वापसी की राह न थी
    कल एक राहगुज़र का पता लगा है मुझे

    सड़क पे चलते हुए आँखें बंद रखता हूँ
    तिरे जमाल का ऐसा मज़ा पड़ा है मुझे

    अभी तलक तो कोई वापसी की राह न थी
    कल एक राहगुज़र का पता लगा है मुझे
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    Aashufta Changezi
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