Aashufta Changezi

Aashufta Changezi

@aashufta-changezi

Aashufta Changezi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Aashufta Changezi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

हमें भी आज ही करना था इंतिज़ार उस का उसे भी आज ही सब वादे भूल जाने थे — Aashufta Changezi

Ghazal

सभी को अपना समझता हूँ क्या हुआ है मुझे बिछड़ के तुझ से अजब रोग लग गया है मुझे जो मुड़ के देखा तो हो जाएगा बदन पत्थर कहानियों में सुना था सो भोगना है मुझे मैं तुझ को भूल न पाया यही ग़नीमत है यहाँ तो इस का भी इम्कान लग रहा है मुझे मैं सर्द जंग की आदत न डाल पाऊँगा कोई महाज़ पे वापस बुला रहा है मुझे सड़क पे चलते हुए आँखें बंद रखता हूँ तिरे जमाल का ऐसा मज़ा पड़ा है मुझे अभी तलक तो कोई वापसी की राह न थी कल एक राह-गुज़र का पता लगा है मुझे सड़क पे चलते हुए आँखें बंद रखता हूँ तिरे जमाल का ऐसा मज़ा पड़ा है मुझे अभी तलक तो कोई वापसी की राह न थी कल एक राह-गुज़र का पता लगा है मुझे — Aashufta Changezi

Nazm

अज़िय्यत और इस सुकूँ दोनों को ही दिल खोल के मैं ने लुटाया है हज़ारों बार ऐसा भी हुआ है दोस्तों की रहनुमाई में फिरा हूँ मारा मारा शहर की आबाद सड़कों पर कभी वीरान गलियों में कभी सहराओं की भी ख़ाक छानी है मगर इस बार जाने क्या हुआ मुझ को नुमाइश की दुकानों में सजा कर ख़ुद को घर वापस चला आया अभी दरवाज़ा मैं ने खटखटाया था कि घर वालों ने कीना-तूज़ नज़रों से मुझे देखा जब उन की आँखों में, कोई रमक़ पहचान की मैं ने नहीं पाई तो उल्टे पैरों वापस लौट आया हूँ और अब ये सोचता हूँ दोस्तों की रहनुमाई में उन्हीं गलियों में सहराओं में जा कर अपने क़दमों के निशाँ ढूँडूँ — Aashufta Changezi
ख़ुदा-ए-लम-यज़ल की बारगाह में सर-ब-सुजूद! अना की चौखटों में जुड़े चेहरों वाले लोग पेशानियों पर ग़ट्टे डालने में मसरूफ़ हैं आटे में सनी मुट्ठियाँ उन की बख़्शिश की ज़मानत हैं ये कौन सी जन्नत-ए-नईम है जिस का रास्ता चि यूँँटियों की बाँबी से हो कर गुज़रता है दरबानों और कुत्तों को खुली आज़ादी है 'जागते रहो' की सदाएँ इनायतों का ख़िराज वसूल करते नहीं थकती हैं सर्कस का पंडाल खचा-खच भरा है मेम्नों के बाड़े में सहमा-दुबका…घास खाता शे'र कैसा बे-ज़रर दिखाई देता है बौनों की उछल-कूद फ़लक-शगाफ़ क़हक़हे…मुसलसल क़हक़हे तालियों की गूँज! महल-सारा के बंद फाटक को छू कर लौट आती है बस्ती के जहाँ-दीदा बूढ़े फ़रियादी मातम करते पंडाल से रवाना हो जाते हैं — Aashufta Changezi
दयार-ए-ख़्वाब के उधर मुसाफ़िरों की बस्तियाँ नशीली काली बदलियाँ शराबियों की टोलियाँ नशा बढ़ाती धानी धानी चुनरियाँ महकते कुँवारे जिस्म चिलमनों की तीलियाँ सजीली रेशमी परों में रंग-बिरंगी तितलियाँ पकी पकाई औरतों में शहवतों की बिजलियाँ ज़रा सी रात भीग जाए, फिर सुनो अंधेरे की ज़बाँ थके थकाए जिस्म हाँफती लटकती छातियाँ शफ़ीक़ आँखें माँओं की रहीम लोरियाँ ख़िज़ाँ लुटाती कहकशाँ, धुआँ उगलती चिमनियाँ धड़कते दिल, निढाल जिस्म, धूप के मकाँ सुनहरे सुर्ख़ पैरहन भिगोती शहर-ज़ादियाँ गदेले गंदे पोखरों में तैरती हैं मछलियाँ न जाने किस गुनाह की सज़ा में बहती नदियाँ ज़रा सी रात भीग जाए, फिर सुनो अंधेरे की ज़बाँ दयार-ए-ख़्वाब के उधर मुसाफ़िरों की बस्तियाँ — Aashufta Changezi
आज उन्हों ने ऐलान कर ही दिया देखो! हम ने तुम्हारी सब की सब क़ुव्वतों का फ़ैसला किया था क़ील-ओ-क़ाल की गुंजाइश बाक़ी नहीं है तुम्हारे इक़रार-नामे हमारे पास महफ़ूज़ हैं तुम से पहले वालों की ख़ता यही थी कि उन्हें, अपनी नाफ़ के नीचे सरसराहट का एहसास कुछ ज़ियादा ही हो चला था उन्हें शहर-बदर कर दिया गया उन के पछतावे और गिड़गिड़ाहटें आज भी हमारे कानों में महफ़ूज़ हैं तुम्हें इतनी छूट दी ही क्यूँँ जाए कि तुम कल हमारे मुक़ाबले पर उतर आओ हम तुम्हें होशियार किए देते हैं दीवारें फलांगने वाले इताब से बच नहीं सकते अक़्द-नामों पर तुम्हारे दस्तख़त तुम्हारी ना-मुरादी का खुला ए'तिराफ़ हैं इस के बग़ैर हमारी हरम-सरा में दाख़िल होने के इजाज़त-नामे तुम्हें मिल भी कैसे सकते थे इस से पहले कि हमारे नजीबुत-तरफ़ैन शजरे मश्कूक हो जाएँ और हमारे हसब-नसब पर आँच आ जाए हम! तुम से पहले गुलू-ख़लासी का रास्ता ढूँड निकालेंगे!! — Aashufta Changezi