मैं हूँ पतंग-ए-काग़ज़ी डोर है उस के हाथ में
    चाहा इधर घटा दिया चाहा उधर बढ़ा दिया
    Nazeer Akbarabadi
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    मुँह ज़र्द-ओ-आह-ए-सर्द ओ लब-ए-ख़ुश्क ओ चश्म-ए-तर
    सच्ची जो दिल-लगी है तो क्या क्या गवाह है
    Nazeer Akbarabadi
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    दिन जल्दी जल्दी चलता हो तब देख बहारें जाड़े की
    और पाला बर्फ़ पिघलता हो तब देख बहारें जाड़े की
    Nazeer Akbarabadi
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    "राखी"
    चली आती है अब तो हर कहीं बाज़ार की राखी
    सुनहरी सब्ज़ रेशम ज़र्द और गुलनार की राखी
    बनी है गो कि नादिर ख़ूब हर सरदार की राखी
    सलोनों में अजब रंगीं है उस दिलदार की राखी
    न पहुँचे एक गुल को यार जिस गुलज़ार की राखी

    अयाँ है अब तो राखी भी चमन भी गुल भी शबनम भी
    झमक जाता है मोती और झलक जाता है रेशम भी
    तमाशा है अहा हा-हा ग़नीमत है ये आलम भी
    उठाना हाथ प्यारे वाह-वा टुक देख लें हम भी
    तुम्हारी मोतियों की और ज़री के तार की राखी

    मची है हर तरफ़ क्या क्या सलोनों की बहार अब तो
    हर इक गुल-रू फिरे है राखी बाँधे हाथ में ख़ुश हो
    हवस जो दिल में गुज़रे है कहूँ क्या आह मैं तुम को
    यही आता है जी में बन के बाम्हन, आज तो यारो
    मैं अपने हाथ से प्यारे के बाँधूँ प्यार की राखी

    हुई है ज़ेब-ओ-ज़ीनत और ख़ूबाँ को तो राखी से
    व-लेकिन तुम से ऐ जाँ और कुछ राखी के गुल फूले
    दिवानी बुलबुलें हों देख गुल चुनने लगीं तिनके
    तुम्हारे हाथ ने मेहंदी ने अंगुश्तों ने नाख़ुन ने
    गुलिस्ताँ की चमन की बाग़ की गुलज़ार की राखी

    अदा से हाथ उठते हैं गुल-ए-राखी जो हिलते हैं
    कलेजे देखने वालों के क्या क्या आह छिलते हैं
    कहाँ नाज़ुक ये पहुँचे और कहाँ ये रंग मिलते हैं
    चमन में शाख़ पर कब इस तरह के फूल खिलते हैं
    जो कुछ ख़ूबी में है उस शोख़-ए-गुल-रुख़्सार की राखी

    फिरें हैं राखियाँ बाँधे जो हर दम हुस्न के तारे
    तो उन की राखियों को देख ऐ जाँ चाव के मारे
    पहन ज़ुन्नार और क़श्क़ा लगा माथे उपर बारे
    'नज़ीर' आया है बाम्हन बन के राखी बाँधने प्यारे
    बँधा लो उस से तुम हँस कर अब इस त्यौहार की राखी
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    Nazeer Akbarabadi
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    चली आती है अब तो हर कहीं बाज़ार की राखी
    सुनहरी सब्ज़ रेशम ज़र्द और गुलनार की राखी
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    बाज़ार गली और कूचों में ग़ुल-शोर मचाया होली ने
    दिल शाद किया और मोह लिया ये जौबन पाया होली ने
    Nazeer Akbarabadi
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    जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की
    और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की
    Nazeer Akbarabadi
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    जुदा किसी से किसी का ग़रज़ हबीब न हो
    ये दाग़ वो है कि दुश्मन को भी नसीब न हो
    Nazeer Akbarabadi
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    हर आन तुम्हारे छुपने से ऐसा ही अगर दुख पाएँगे हम
    तो हार के इक दिन इस की भी तदबीर कोई ठहराएँगे हम

    बेज़ार करेंगे ख़ातिर को पहले तो तुम्हारी चाहत से
    फिर दिल को भी कुछ मिन्नत से कुछ हैबत से समझाएँगे हम

    गर कहना दिल ने मान लिया और रुक बैठा तो बहत्तर है
    और चैन न लेने देवेगा तो भेस बदल कर आएँगे हम

    अव्वल तो नहीं पहचानोगे और लोगे भी पहचान तो फिर
    हर तौर से छुप कर देखेंगे और दिल को ख़ुश कर जाएँगे हम

    गर छुपना भी खुल जावेगा तो मिल कर अफ़्सूँ-साज़ों से
    कुछ और ही लटका सेहर-भरा उस वक़्त बहम पहुँचाएँगे हम

    जब वो भी पेश न जावेगा और शोहरत होवेगी फिर तो
    जिस सूरत से बन आवेगा तस्वीर खिंचा मंंगवाएँगे हम

    मौक़ूफ़ करोगे छुपने को तो बेहतर वर्ना 'नज़ीर' आसा
    जो हर्फ़ ज़बाँ पर लाएँगे फिर वो ही कर दिखलाएँगे हम
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    Nazeer Akbarabadi
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    हर इक मकाँ में जला फिर दिया दिवाली का
    हर इक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का
    Nazeer Akbarabadi
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