Nazeer Akbarabadi

Nazeer Akbarabadi

@nazeer-akbarabadi

Nazeer Akbarabadi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Nazeer Akbarabadi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मैं हूँ पतंग-ए-काग़ज़ी डोर है उस के हाथ में चाहा इधर घटा दिया चाहा उधर बढ़ा दिया — Nazeer Akbarabadi
दिन जल्दी जल्दी चलता हो तब देख बहारें जाड़े की और पाला बर्फ़ पिघलता हो तब देख बहारें जाड़े की — Nazeer Akbarabadi
है दसहरे में भी यूँँ गर फ़रहत-ओ-ज़ीनत 'नज़ीर' पर दिवाली भी अजब पाकीज़ा-तर त्यौहार है — Nazeer Akbarabadi
बाज़ार गली और कूचों में ग़ुल-शोर मचाया होली ने दिल शाद किया और मोह लिया ये जौबन पाया होली ने — Nazeer Akbarabadi
जुदा किसी से किसी का ग़रज़ हबीब न हो ये दाग़ वो है कि दुश्मन को भी नसीब न हो — Nazeer Akbarabadi
मुँह ज़र्द-ओ-आह-ए-सर्द ओ लब-ए-ख़ुश्क ओ चश्म-ए-तर सच्ची जो दिल-लगी है तो क्या क्या गवाह है — Nazeer Akbarabadi
दोस्तो क्या क्या दिवाली में नशात-ओ-ऐश है सब मुहय्या है जो इस हंगाम के शायाँ है शय — Nazeer Akbarabadi
चली आती है अब तो हर कहीं बाज़ार की राखी सुनहरी सब्ज़ रेशम ज़र्द और गुलनार की राखी — Nazeer Akbarabadi
जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की — Nazeer Akbarabadi
हर इक मकाँ में जला फिर दिया दिवाली का हर इक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का — Nazeer Akbarabadi

Ghazal

हर आन तुम्हारे छुपने से ऐसा ही अगर दुख पाएँगे हम तो हार के इक दिन इस की भी तदबीर कोई ठहराएँगे हम बेज़ार करेंगे ख़ातिर को पहले तो तुम्हारी चाहत से फिर दिल को भी कुछ मिन्नत से कुछ हैबत से समझाएँगे हम गर कहना दिल ने मान लिया और रुक बैठा तो बहत्तर है और चैन न लेने देवेगा तो भेस बदल कर आएँगे हम अव्वल तो नहीं पहचानोगे और लोगे भी पहचान तो फिर हर तौर से छुप कर देखेंगे और दिल को ख़ुश कर जाएँगे हम गर छुपना भी खुल जावेगा तो मिल कर अफ़्सूँ-साज़ों से कुछ और ही लटका सेहर-भरा उस वक़्त बहम पहुँचाएँगे हम जब वो भी पेश न जावेगा और शोहरत होवेगी फिर तो जिस सूरत से बन आवेगा तस्वीर खिंचा मंगवाएँगे हम मौक़ूफ़ करोगे छुपने को तो बेहतर वर्ना 'नज़ीर' आसा जो हर्फ़ ज़बाँ पर लाएँगे फिर वो ही कर दिखलाएँगे हम — Nazeer Akbarabadi

Nazm

"राखी" चली आती है अब तो हर कहीं बाज़ार की राखी सुनहरी सब्ज़ रेशम ज़र्द और गुलनार की राखी बनी है गो कि नादिर ख़ूब हर सरदार की राखी सलोनों में अजब रंगीं है उस दिलदार की राखी न पहुँचे एक गुल को यार जिस गुलज़ार की राखी अयाँ है अब तो राखी भी चमन भी गुल भी शबनम भी झमक जाता है मोती और झलक जाता है रेशम भी तमाशा है अहा हा-हा ग़नीमत है ये आलम भी उठाना हाथ प्यारे वाह-वा टुक देख लें हम भी तुम्हारी मोतियों की और ज़री के तार की राखी मची है हर तरफ़ क्या क्या सलोनों की बहार अब तो हर इक गुल-रू फिरे है राखी बाँधे हाथ में ख़ुश हो हवस जो दिल में गुज़रे है कहूँ क्या आह मैं तुम को यही आता है जी में बन के बाम्हन, आज तो यारो मैं अपने हाथ से प्यारे के बाँधूँ प्यार की राखी हुई है ज़ेब-ओ-ज़ीनत और ख़ूबाँ को तो राखी से व-लेकिन तुम से ऐ जाँ और कुछ राखी के गुल फूले दिवानी बुलबुलें हों देख गुल चुनने लगीं तिनके तुम्हारे हाथ ने मेहंदी ने अंगुश्तों ने नाख़ुन ने गुलिस्ताँ की चमन की बाग़ की गुलज़ार की राखी अदा से हाथ उठते हैं गुल-ए-राखी जो हिलते हैं कलेजे देखने वालों के क्या क्या आह छिलते हैं कहाँ नाज़ुक ये पहुँचे और कहाँ ये रंग मिलते हैं चमन में शाख़ पर कब इस तरह के फूल खिलते हैं जो कुछ ख़ूबी में है उस शोख़-ए-गुल-रुख़्सार की राखी फिरें हैं राखियाँ बाँधे जो हर दम हुस्न के तारे तो उन की राखियों को देख ऐ जाँ चाव के मारे पहन ज़ुन्नार और क़श्क़ा लगा माथे उपर बारे 'नज़ीर' आया है बाम्हन बन के राखी बाँधने प्यारे बँधा लो उस से तुम हँस कर अब इस त्यौहार की राखी — Nazeer Akbarabadi
"दीवाली" हर इक मकाँ में जला फिर दिया दिवाली का हर इक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का सभी के दिल में समाँ भा गया दिवाली का किसी के दिल को मज़ा ख़ुश लगा दीवाली का अजब बहार का है दिन बना दिवाली का जहाँ में यारो अजब तरह का है ये त्यौहार किसी ने नक़्द लिया और कोई करे है उधार खिलौने खेलों बताशों का गर्म है बाज़ार हर इक दुकाँ में चराग़ों की हो रही है बहार सभों को फ़िक्र है अब जा-ब-जा दिवाली का मिठाइयों की दुकानें लगा के हलवाई पुकारते हैं कि ''ला ला! दिवाली है आई'' बताशे ले कोई बर्फ़ी किसी ने तुलवाई खिलौने वालों की इन से ज़ियादा बिन आई गोया उन्हों के वाँ राज आ गया दिवाली का सिर्फ़ हराम की कौड़ी का जिन का है बेवपार उन्हों ने खाया है इस दिन के वास्ते है उधार कहे है हँस के क़रज़-ख़्वाह से हर इक इक बार दिवाली आई है सब दे दिलाएँगे ऐ यार ख़ुदा के फ़ज़्ल से है आसरा दिवाली का मकान लेप के ठलिया जो कोरी रखवाई जला चराग़ को कौड़ी वो जल्द झनकाई असल जुआरी थे उन में तो जान सी आई ख़ुशी से कूद उछल कर पुकारे ओ भाई शुगून पहले करो तुम ज़रा दिवाली का शगुन की बाज़ी लगी पहले यार गंडे की फिर उस से बढ़ के लगी तीन चार गंडे की फिरी जो ऐसी तरह बार बार गंडे की तो आगे लगने लगी फिर हज़ार गंडे की कमाल निर्ख़ है फिर तो लगा दिवाली का किसी ने घर की हवेली गिरो रखा हारी जो कुछ थी जिंस मुयस्सर बना बना हारी किसी ने चीज़ किसी किसी की चुरा छुपा हारी किसी ने गठरी पड़ोसन की अपनी ला हारी ये हार जीत का चर्चा पड़ा दिवाली का किसी को दाव पे लानक्की मूठ ने मारा किसी के घर पे धरा सोख़्ता ने अँगारा किसी को नर्द ने चौपड़ के कर दिया ज़ारा लंगोटी बाँध के बैठा इज़ार तक हारा ये शोर आ के मचा जा-ब-जा दिवाली का वो उस के झोंटे पकड़ कर कहे है मारुँगा तिरा जो गहना है सब तार तार उतारूँगा हवेली अपनी तो इक दाव पर मैं हारूँगा ये सब तो हारा हूँ ख़ंदी तुझे भी हारूँगा चढ़ा है मुझ को भी अब तो नशा दिवाली का तुझे ख़बर नहीं ख़ंदी ये लत वो प्यारी है किसी ज़माने में आगे हुआ जो ज्वारी है तो उस ने जोरू की नथ और इज़ार उतारी है इज़ार क्या है कि जोरू तलक भी हारी है सुना ये तू ने नहीं माजरा दिवाली का जहाँ में ये जो दीवाली की सैर होती है तो ज़र से होती है और ज़र बग़ैर होती है जो हारे उन पे ख़राबी की फ़ैर होती है और उन में आन के जिन जिन की ख़ैर होती है तो आड़े आता है उन के दिया दिवाली का ये बातें सच हैं न झूट उन को जानियो यारो! नसीहतें हैं उन्हें दिल से मानियो यारो! जहाँ को जाओ ये क़िस्सा बखानियो यारो! जो ज्वारी हो न बुरा उस का मानियो यारो 'नज़ीर' आप भी है ज्वारिया दीवाली का — Nazeer Akbarabadi
जिस दम चमन में चाँद की हों खु़श जमालियां और झूमती हों बाग़ में फूलों की डालिया बहती हों मैं के जोश से इश्रत की नालियां कानों में नाज़नीं के झलकती हों बालियाँ ऐशो तरब की धूम नशों की बहालियां जब चांदनी की देखिए ! रातें उजालियां बैठी हो चांदनी सी वो जो सुखऱ गुलइज़ार और बादले का तन में झलकता है तार-तार हाथों में गजरा, कान में गुच्छे, गले में हार हर दम नशे में प्यार से हंस-हंस के बार-बार हम छेड़ते हों उस को वो देती हो गालियां जब चांदनी की देखिए ! रातें उजालियां ऐसी ही चांदनी की बना कर वो फवन चम्पाकली जड़ाऊं वो हीरे का नौ रतन गहने से चांदनी के झमकता हो गुल बदन और चाँद की झलक से वो गोरा सा उस का तन दिखला रहा हो कुर्ता औ अंगिया की जालियां जब चांदनी की देखिए ! रातें उजालियां दी हो इधर तो चाँद ने और चांदनी बिछा उधर वो चांदनी सा जो वो सुर्ख़ महलक़ा मैं की गुलाबियां भी झलकती हों जा बजा और नाज़नीं नशे में सुराही उठा-उठा देती हो अपने हाथ से भर-भर के प्यालियां जब चांदनी की देखिए ! रातें उजालियां वो गुल-बदन कि हुस्न का जिस के मचा हो शोर करती हो बैठी नाज़ से सौ चांदनी पे ज़ोर छल्ले भी उँगलियों में झलकते हों पोर-पोर हम भी हों पास शोख़ के ज्यूँ चाँद और चकोर दोनों गले में प्यार से बाहें हों डालियां जब चांदनी की देखिए ! रातें उजालियां गुलशन में बिछ रहा हो रुपहला सा इक पलंग होती हो उस पलंग उपर उल्फ़तों की जंग उस वक़्त ऐसे होते हों ऐशो तरब के रंग जो चांदनी में देखके इश्रत के रंग ढंग मैं से भी झमकें ऐश की हों दिल में डालियां जब चांदनी की देखिए ! रातें उजालियां ईधर तो हुस्ने बाग़ उधर चाँद की झलक ऊधर वो नाज़नीं भी नशे में रही चहक देती हो बोसा प्यार से हरदम चहक-चहक हर आन बैठती हो बग़ल में सरक-सरक मुँह पै नशों की सुर्खि़यां आँखों में लालियां जब चांदनी की देखिए ! रातें उजालियां निखरा हो चाँद नूर में ढलती चली हो रात फूलों की बास आती हो हरदम हवा के साथ वो नाज़नीं कि चाँद भी होता है जिस सेे मात बैठी हो सौ बनाव से डाले गले में हाथ गाती हो और नशे में बजाती हो तालियां जब चांदनी की देखिए ! रातें उजालियां आ कर इधर तो चांदनी छिटकी हो दिल पज़ीर और उस तरफ़ बग़ल में जो हो अचपली शरीर दिल उस परी के नाज़ो अदा बीच हो असीर ले शाम से सहर तईं ऐश हो ”नज़ीर“ सब दिल की हसरतें हों ख़ुशी से निकालियां जब चांदनी की देखिए ! रातें उजालियां — Nazeer Akbarabadi
क्या इल्म उन्होंने सीख लिया जो बिन लिक्खे को बाँचे हैं और बात नहीं निकले मुँह से बिन होठ हिलाए जाँचे हैं दिल उन के तार सितारों के तन उन के तबल तमाचे हैं मुँहचंग ज़बाँ दिल सारंगी या घुँघरू हाथ कमाचे हैं है राग उन्हीं के रंग भरे और भाव उन्हीं के साँचे हैं जो बेगत बे-सुर ताल हुए बिन ताल पखावज नाचे हैं कुल बाजे बजकर टूट गए आवाज लगी जब भर्राने और छम छम घुँघरू बंद हुए तब गत का अंत लगे पाने संगीत नहीं ये संगत है संतों का जिस सेे जी माने ये नाच कोई क्या पहिचाने इस नाच को नाचे सो जाने जब हाथ को धोया हाथों से और हाथ लगे फड़काने को और पाँवों को खींचा पावों से तब पाँव लगे गत पाने को जब आँख उठाली हँसने से और नैन लगे मटकाने को सब काछ कछे सब नाच नचे उस रसिया छैल रिझाने को जो आग जिगर में भड़की है उस शो'ले की उजियाली है जो मुँह पर हुस्न की जर्दी है उस जर्दी की सब लाली है जिस गत पर उन का पाँव पड़ा उस गत की चाल निराली है जिस मज्लिस में वो नाचे हैं वो मज्लिस सब से ख़ाली है सब घटता बढ़ता फेंक उधर और ध्यान इधर धर भरते हैं बिन तारों तार मिलाते हैं जब नृत्य निराला करते हैं बिन गहने झमक दिखाते हैं बिन जूड़े मन को हरते हैं बिन हाथों भाव बताते हैं बिन पाँव खड़े गत भरते हैं था जिन की ख़ातिर नाच बना तब सूरत उन की आई गई कहीं आप हुए कहीं नाच हुआ और तान कहीं भर्राई गई अब छैल छबीले सुंदर की छबि नैन के अंदर छाई गई एक सूरत लाल त्रिभंगी की और जोति में जोति समाय गई सब होश बदन का दूर हुआ जब गत पर आ मृदंग बजे तन भंग हुआ दिल भंग हुआ सब आन गई बे आन सजे ये नाचा कौन ‘नज़ीर’ और यां किस लिए रचाया नाच अज़ी जब बूँद ही जा दरियाव पड़ी उस तान का आख़िर निकला जी हैं राग उन्हीं के रंग भरे और भाव उन्हीं के सांचे हैं — Nazeer Akbarabadi