Fahmida Riaz

Fahmida Riaz

@fahmida-riaz

Fahmida Riaz shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Fahmida Riaz's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

1

Content

47

Likes

2

Shayari
Audios
  • Ghazal
  • Nazm

Ghazal

चार-सू है बड़ी वहशत का समाँ किसी आसेब का साया है यहाँ कोई आवाज़ सी है मर्सियाँ-ख़्वाँ शहर का शहर बना गोरिस्ताँ एक मख़्लूक़ जो बस्ती है यहाँ जिस पे इंसाँ का गुज़रता है गुमाँ ख़ुद तो साकित है मिसाल-ए-तस्वीर जुम्बिश-ए-ग़ैर से है रक़्स-कुनाँ कोई चेहरा नहीं जुज़ ज़ेर-ए-नक़ाब न कोई जिस्म है जुज़ बे-दिल-ओ-जाँ उलमा हैं दुश्मन-ए-फ़हम-ओ-तहक़ीक़ कोदनी शेवा-ए-दानिश-मंदाँ शाइ'र-ए-क़ौम पे बन आई है किज़्ब कैसे हो तसव्वुफ़ में निहाँ लब हैं मसरूफ़-ए-क़सीदा-गोई और आँखों में है ज़िल्लत उर्यां सब्ज़ ख़त आक़िबत-ओ-दीं के असीर पारसा ख़ुश-तन-ओ-नौ-ख़ेज़ जवाँ ये ज़न-ए-नग़्मा-गर-ओ-इश्क़-शिआ'र यास-ओ-हसरत से हुई है हैराँ किस से अब आरज़ू-ए-वस्ल करें इस ख़राबे में कोई मर्द कहाँ — Fahmida Riaz
ये पैरहन जो मेरी रूह का उतर न सका तो नख़-ब-नख़ कहीं पैवस्त रेशा-ए-दिल था मुझे मआल-ए-सफ़र का मलाल क्यूँँकर हो कि जब सफ़र ही मेरा फ़ासलों का धोका था मैं जब फ़िराक़ की रातों में उस के साथ रही वो फिर विसाल के लम्हों में क्यूँँ अकेला था वो वास्ते की तेरा दरमियाँ भी क्यूँँ आए ख़ुदा के साथ मेरा जिस्म क्यूँँ न हो तन्हा सराब हूँ मैं तेरी प्यास क्या बुझाऊँगी इस इश्तियाक़ से तिश्ना ज़बाँ क़रीब न ला सराब हूँ कि बदन की यही शहादत है हर एक उज़्व में बहता है रेत का दरिया जो मेरे लब पे है शायद वही सदाक़त है जो मेरे दिल में है उस हर्फ़-ए-राएगाँ पे न जा जिसे मैं तोड़ चुकी हूँ वो रौशनी का तिलिस्म शुआ-ए-नूर-ए-अज़ल के सिवा कुछ और न था — Fahmida Riaz

Nazm

दुनिया की लंबी राहों पर हम यूँँ तो चलते जाते हैं कुछ ऐसे लोग भी मिलते हैं जो याद हमेशा आते हैं वो राह बदलते हैं अपनी और मुड़ कर हाथ हिलाते हैं लेकिन वो दिलों को यादों की ख़ुशबू बन कर महकाते हैं ऐसे ही सफ़र करते-करते इक शख़्स मिला हम को भी कहीं दुनिया में अच्छे लोग बहुत लेकिन उस की सी बात नहीं वो धीमे लहजे वाला था और धीरे से हँसता था जितने भी लोग मिले हम को सच जानो सब से अच्छा था थी लाग न उस के बोलों में की बात न कोई लगावट की उस के फ़िक़रे टूटे-टूटे उस की आँखें खोई-खोई कह कर ही न दे जो हम चाहें सोचा ही करे बैठा-बैठा पर देखे ऐसी नरमी से इक बार तो हो जाए धोका गो साथ हमारा ख़ूब रहा उस को न हुई पहचान बहुत गर बूझ ले दिल की बात कभी हो जाता था हैरान बहुत और हम उस की हैरानी पर शर्मिंदा हो कर रह जाते कुछ और हमारा मतलब था फिर देर तलक ये समझाते अब चेहरा उस का उजला हो या आँखें उस की हों गहरी या उस के प्यारे होंटों की हर बात लगे ठहरी-ठहरी कुछ अच्छे लोग जो अच्छे होते हैं और राहों में मिल जाते हैं हैं उन को अपने काम बहुत कब अपना वक़्त गँवाते हैं कब प्यासे-प्यासे रहते हैं कब जी को रोग लगाते हैं — Fahmida Riaz
ऐ दोस्त पुराने पहचाने हम कितनी मुद्दत बा'द मिले और कितनी सदियों बा'द मिली ये एक निगाह-ए-महर-ओ-सख़ा जो अपनी सख़ा से ख़ुद पुर-नम बैठो तो ज़रा बतलाओ तो क्या ये सच है मेरे तआक़ुब में फिरता है हुजूम-ए-संग-ज़नाँ? क्या नील बहुत हैं चेहरे पर? क्या कासा-ए-सर है ख़ून से तर? पैवंद-ए-क़बा दुश्नाम बहुत पैवस्त-ए-जिगर इल्ज़ाम बहुत ये नज़र-ए-करम क्यूँँ है पुर-नम? जब निकले कू-ए-मलामत में इक ग़ौग़ा तो हम ने भी सुना तिफ़्लाँ की तो कुछ तक़्सीर न थी हम आप ही थे यूँँ ख़ुद-रफ़्ता मदहोशी ने मोहलत ही न दी हम मुड़ के नज़ारा कर लेते बचने की तो सूरत ख़ैर न थी दरमाँ का ही चारा कर लेते पल भर भी हमारे कार-ए-जुनूँ ग़फ़लत जो गवारा कर लेते — Fahmida Riaz
दिल्ली! तिरी छाँव बड़ी क़हरी मिरी पूरी काया पिघल रही मुझे गले लगा कर गली गली धीरे से कहे'' तू कौन है री?'' मैं कौन हूँ माँ तिरी जाई हूँ पर भेस नए से आई हूँ मैं रमती पहुँची अपनों तक पर प्रीत पराई लाई हूँ तारीख़ की घोर गुफाओं में शायद पाए पहचान मिरी था बीज में देस का प्यार घुला परदेस में क्या क्या बेल चढ़ी नस नस में लहू तो तेरा है पर आँसू मेरे अपने हैं होंटों पर रही तिरी बोली पर नैन में सिंध के सपने हैं मन माटी जमुना घाट की थी पर समझ ज़रा उस की धड़कन इस में कारूंझर की सिसकी इस में हो के डालता चलतन! तिरे आँगन मीठा कुआँ हँसे क्या फल पाए मिरा मन रोगी इक रीत नगर से मोह मिरा बसते हैं जहाँ प्यासे जोगी तिरा मुझ से कोख का नाता है मिरे मन की पीड़ा जान ज़रा वो रूप दिखाऊँ तुझे कैसे जिस पर सब तन मन वार दिया क्या गीत हैं वो कोह-यारों के क्या घाइल उन की बानी है क्या लाज रंगी वो फटी चादर जो थर्की तपत ने तानी है वो घाव घाव तन उन के पर नस नस में अग्नी दहकी वो बाट घिरी संगीनों से और झपट शिकारी कुत्तों की हैं जिन के हाथ पर अँगारे मैं उन बंजारों की चीरी माँ उन के आगे कोस कड़े और सर पे कड़कती दो-पहरी मैं बंदी बाँधूँ की बाँदी वो बंदी-ख़ाने तोड़ेंगे है जिन हाथों में हाथ दिया सो सारी सलाख़ें मोड़ेंगे तू सदा सुहागन हो माँ री! मुझे अपनी तोड़ निभाना है री दिल्ली छू कर चरण तिरे मुझ को वापस मुड़ जाना है — Fahmida Riaz
तुम ने देखी है कभी एक ज़न-ए-ख़ाना-ब-दोश जिस के ख़ेमे से परे रात की तारीकी में गुरसना भेड़िए ग़ुर्राते हैं दूर से आती है जब उस की लहू की ख़ुश्बू सनसनाती हैं दरिंदों की हँसी और दाँतों में कसक होती है कि करें उस का बदन सद-पारा अपने ख़ेमे में सिमट कर औरत रात आँखों में बिता देती है कभी करती है अलाव रौशन भेड़िए दूर भगाने के लिए कभी करती है ख़याल तेज़ नुकीला जो औज़ार कहीं मिल जाए तो बना ले हथियार उस के ख़ेमे में भला क्या होगा टूटे फूटे हुए बर्तन दो-चार दिल के बहलाने को शायद ये ख़याल आते हैं उस को मालूम है शायद न सहर हो पाए सोते बच्चों पे जमाए नज़रें कान आहट पे धरे बैठी है हाँ ध्यान उस का जो बट जाए कभी गुनगुनाती है कोई बिसरा गीत किसी बंजारे का — Fahmida Riaz
ये तो बर्ज़ख़ है यहाँ वक़्त की ईजाद कहाँ इक बरस था कि महीना हमें अब याद कहाँ वही तपता हुआ गर्दूं वही अँगारा ज़मीं जा-ब-जा तिश्ना ओ आशुफ़्ता वही ख़ाक-नशीं शब-गराँ ज़ीस्त-गराँ-तर ही तो कर जाती थी सूद-ख़ोरों की तरह दर पे सहर आती थी ज़ीस्त करने की मशक़्क़त ही हमें क्या कम थी मुस्ताज़ाद उस पे पिरोहित का जुनून-ए-ताज़ा सब को मिल जाए गुनाहों का यहीं ख़म्याज़ा ना-रवा-दार फ़ज़ाओं की झुलसती हुई लू! मोहतसिब कितने निकल आए घरों से हर सू ताड़ते हैं किसी चेहरे पे तरावत तो नहीं कोई लब नम तो नहीं बशरे पे फ़रहत तो नहीं कूचा कूचा में निकाले हुए ख़ूनी दीदे गुर्ज़ उठाए हुए धमकाते फिरा करते हैं नौ-ए-आदम से बहर-तौर रिया के तालिब रूह बे-ज़ार है क्यूँँ छोड़ न जाए क़ालिब ज़िंदगी अपनी इसी तौर जो गुज़री 'ग़ालिब' हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे — Fahmida Riaz
इक दिन जो बहम होंगे तुझ से तिरे दरमाँदा क्या अर्ज़ गुज़ारेंगे क्या हाल सुनाएँगे मौहूम कशीदा है तस्वीर क़यामत की शायद न सुना पाएँ तफ़्सील मसाफ़त की लब बस्ता रहें शायद ये दिन जो गुज़ारे हैं महरम है कोई किस का या ज़ख़्म की सरगोशी या हमारे हैं आँखों पे किए साया कब दूर तलक देखा लर्ज़ां थी ज़मीं किस पल कब सू-ए-फ़लक देखा कब दश्त की तन्हाई आँखों में उतर आई कब वहम समाअ'त थी कब खो गई गोयाई किस मोड़ पे हैराँ थे किस राह में वीराँ थे इज्माल हक़ीक़त के शायद न रक़म होंगे इक दिन जो बहम होंगे तक लेंगे तिरी सूरत और सर को झुका लेंगे मल डालेंगे आँखों को गर याद सराब आए गुम-सुम तिरी चौखट पर हो जाएँगे हम शायद छू कर तिरे दामन को सो जाएँगे हम शायद — Fahmida Riaz
आसमाँ तपते हुए लोहे की मानिंद सफ़ेद रेग सूखी हुई प्यासे की ज़बाँ की मानिंद प्यास हुल्क़ूम में है जिस्म में है जान में है सर-ब-ज़ानू हूँ झुलसते हुए रेगिस्ताँ में तेरी सरकार में ले आई हूँ ये वहश ज़बीह! मुझ पे लाज़िम थी जो क़ुर्बानी वो मैं ने कर दी उस की उबली हुई आँखों में अभी तक है चमक और सियह-बाल हैं भीगे हुए ख़ूँ से अब तक तेरा फ़रमान ये था उस पे कोई दाग़ न हो सो ये बे-ऐब अछूता भी था अन-देखा भी बे-कराँ रेग में सब गर्म लहू जज़्ब हुआ देख चादर पे मिरी सब्त है उस का धब्बा ऐ ख़ुदा-वंद-ए-कबीर ऐ जब्बार! मुतकब्बिर ओ जलील! हाँ तिरे नाम पढ़े और किया ज़ब्ह उसे अब कोई पारा-ए-अब्र आए कहीं साया हो ऐ ख़ुदा-वंद-ए-अज़ीम बाद-ए-तस्कीं! के नफ़स आग बना जाता है! क़तरा-ए-आब कि जाँ लब पे चली आई है — Fahmida Riaz
ऐ दिल-ए-काफ़िर इज्ज़ से मुनकिर आज तिरा सर ख़म क्यूँँ है तेरी हटेली शिरयानों में ये बेबस मातम क्यूँँ है आँख तो रोना भूल गई थी फिर हर मंज़र नम क्यूँँ है मत रोको बहने दो आँसू किसी को करते हैं प्रणाम आप झुका है झुकने दो सर छुपा था उस में कोई सलाम शायद उस के हुज़ूर में हो तुम जिस को कहते हैं अंजाम वो हस्ती की सरहद-ए-आख़िर हुआ जहाँ हर सफ़र तमाम बेबस है इंसाँ बेबस है तकती रह गई रोती शाम उठ गया कोई भरी दुनिया से बाक़ी रहे ख़ुदा का नाम या फिर काग़ज़ पर परछाईं मिलेगा जिस को सब्त-ए-दवाम ये टुकड़े इंसानी दिल के शाएर और शाएर का कलाम नाज़ करूँँगी ख़ुश-बख़्ती में मैं ने 'फ़िराक़' को देखा था उजड़े घर में वो तहज़ीबों के संगम पर बैठा था गर्म हम-आग़ोशी सदियों की होगी कितनी प्यार भरी जिस की बाँहों में खेली थी उस की सोच की सुंदरता शे'र का दिल शफ़्फ़ाफ़ था इतना जैसे आईना-ए-तारीख़ क्या भर पूर विसाल था जिस ने उस शाएर को जन्म दिया गर तारीख़ ने पागल हो कर ख़ुद अपना सर फोड़ा है ख़ून उछाला है गलियों में अपना हंडोला तोड़ा है छींट न थी दामन पर उस के कौन घाट धो बैठा था जिसे समझते हो ना-मुम्किन वो उस इंसाँ जैसा था इंसाँ भी इतना मामूली जैसे अपना हम-साया अपने शे'र सुनाना उस का और ख़ुद हैराँ हो जाना बातों में मासूम महक थी आँखों में बेचैन लपक ख़ामोशी के वक़्फ़े यूँँ जैसे उस ने कुछ देखा था पीड़ बहुत झेली थी उस ने इतनी बात तो ज़ाहिर थी लहजा में शोख़ी थी जैसे राख में चमके अँगारा संगम के पानी पर मैं ने देखी थी कैसी तस्वीर उड़ा लहक कर इक जल-पंछी खींच गया पानी पे लकीर जमुना की नीली गहराई भेद भरी चुप से बोझल गँगा के धारे की जुम्बिश उजली ताक़त और बे-कल इस पानी में अक्स डालता आसमान का इक टुकड़ा मिट्टी के बुत हरे नारियल चंदन लगा कोई मुखड़ा वो धारों पर नाव खेता सूखा पंजर माँझी का दान के पैसे गिनता पंडित ताँबा सूरज सांझी का जमुना पर मीनार क़िला के गुम्बद का तिरछा साया पाकिस्तान से आए मुहाजिर गेंदे की टूटी माला पानी में चप्पू की शप शप बातों के टूटे टुकड़े यहीं कहीं पर हम से ओझल सरस्वती भी बहती है जो समझी जो आगे समझूँ छलक रहा है दिल का जाम वो मंज़र जो ख़ुद से बड़ा था उस का घेरा तुम्हारे नाम ये कमरे का माँद उजाला बाहर हूक पपिहे की खिड़की पर बूँदों की दस्तक साँसें भरती ख़ामोशी पूरी बात नहीं बतलाता गूँगे आँसू रो देना तेरी धरती सह न सकेगी इतने हुस्न को खो देना तन्हा और अपाहिज बूढ़े तुझे न मरने देंगे लोग अभी तो जीवन बाँझ नहीं है फिर तुझ को जन्मेंगे लोग — Fahmida Riaz
आ मेरे अंदर आ पवित्र महरान के पानी ठंडे मीठे मटियाले पानी मटियाले जीवन रंग जल धो दे सारा क्रोध कपट शहरों की दिशाओं का सब छल यूँँ सींच मुझे कर दे मेरी मिट्टी जल-थल तिरे तल की काली चिकनी मिट्टी से माथे पर तिलक लगाऊँ हाथ जोड़ ङंङवत करूँँ ओ मन के भेद से गहरे हौले हौले साँस खींचते ओम समान अमर ओ महान सागर मैं उतरी तेरे ठंडे जल में कमर कमर तेरे ठंडे मीठे मेहरबान पानी से मुँह धो लूँ और धो लूँ आँसू खारे आँसू तेरे मीठे पानी से धो लूँ ओ महान मटियाले सागर आ सुन मिरी कथा मैं बड़ी अभागन भाग मेरा बे-दर्द हाथ में रहा सदा टूटा मेरा मिट्टी से नाता कैसे टूटा इक आँधी बड़ी भयानक लाल चुड़ैल मुझे ले उड़ी उठा कर पटका उस ने कहाँ से कहाँ तेरे चरनों में सीस झुकाती एक अकेली जान मेरे साथ मेरा कोई मीत नहीं कोई रंग रूप कोई प्रीत नहीं मिरी अन-गढ़ फीकी मुरझाती बोली में कोई संगीत नहीं मिरी पीढ़ियों के बीते युग मेरे साथ नहीं बस इक निर्दयी धरम है जिस का भरम नहीं वो धरम जो कहता है मिट्टी मिरी बैरन है जो मुझे सिखाता है सागर मेरा दुश्मन है हाँ दूर कहीं आकाश की ऊँचाई से परे रहता है ख़ुदा इतना रूखा मिट्टी से जोड़ नहीं जिस का सब नाते प्रीत और बैर के उस की कारन मैं कैसे जोड़ूँ मैं मिट्टी मेरा जनम मिट्टी मैं मिट्टी को कैसे छोड़ूँ ओ मटियाले बलवान महा-सागर मैं उखड़ी धरती से भगवान मिरा रस सूख गया फिर भी सुनती हूँ अपने लहू में बीते समय की नर्म धमक वो समय जो मेरे जनम से पहले बीत गया मेरे कानों में इक शोर है झर-झर बहते नद्दी नालों का और कोई महक बड़ी बे-कल है जो गूँज बनी मिरी छाती से टकराती है ओ महान सागर जीवन-रस दे अपने तल में जल-पौदा बन कर जड़ लेने दे सदा जिए ओ महान सागर सिंधू तू सदा जिए और जिएँ तिरे पानी में फिसलती मछलियाँ शांत सुखी यूँँही तिरे पानी में नाव खेते तिरे बालक सदा जिएँ ओ पालन-हार हमारे धरती के रखवाले अन्न-दाता तिरी धरती नर्म रेतीली मेहरबान सिंध की धरती सदा जिए — Fahmida Riaz