उस को इक दिन तो जाना था
मुझ से क्या रिश्ता क्या नाता
बस पल-दो-पल को ठहरा था
पल-दो-पल हँसते गुज़रा था
मैं तब भी सोचा करती थी
ये साथ बड़ा लम्हाती है
जज़्बे की थोड़ी सी गर्मी
जलते छाले बन जाती है
इस बात को बीते साल हुए
फिर दुनिया है पहले जैसी
सब रंग वही रा'नाई वही
सब हुस्न वही पर क्या कीजे
सच्चे थे मिरे सब अंदेशे
अब भी यूँ ही बैठे-बैठे
याद आए तो दिल दुख जाता है
— Fahmida Riaz















