इक हर्फ़-ए-मुद्दआ' था लबों पे खटकता था फाँस सा
इक नाम था ज़बान का छाला बना हुआ
लो मैं ज़बाँ तराश के ख़ामोश हो गई
लो अब तो मेरी आँख में आँसू नहीं कोई
बस एक मेरा गुंग मिरा हर्फ़-ए-मुद्दआ'
— Fahmida Riaz
इक नाम था ज़बान का छाला बना हुआ
लो मैं ज़बाँ तराश के ख़ामोश हो गई
लो अब तो मेरी आँख में आँसू नहीं कोई
बस एक मेरा गुंग मिरा हर्फ़-ए-मुद्दआ'
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