कमाल ये है मुझे देखती हैं वो आँखें
मलाल ये है उन्हें देखना नहीं आता
मलाल ये है उन्हें देखना नहीं आता
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हवस से जिस्म को दो-चार करने वाली हवा
चली हुई है गुनहगार करने वाली हवा
चली हुई है गुनहगार करने वाली हवा
यहीं कहीं मिरा लश्कर पड़ाव डालेगा
यहीं कहीं है गिरफ़्तार करने वाली हवा
तमाम सीना-सिपर पेड़ झुकने वाले हैं
हवा है और निगूँ-सार करने वाली हवा
पड़े हुए हैं यहाँ अब जो सर-बुरीदा चराग़
गुज़िश्ता रात थी यलग़ार करने वाली हवा
हमारी ख़ाक उड़ाती फिरे है शहर-ब-शहर
हमारी रूह का इनकार करने वाली हवा
उसी ख़राबे में रहने की ठान बैठी है
बदन का दश्त नहीं पार करने वाली हवा
न जाने कौन तरफ़ ले के चल पड़े 'आज़र'
धुएँ से मुझ को नुमूदार करने वाली हवा
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कब तक फिरूंगा हाथ में कासा उठा के मैं
जी चाहता है भाग लूँ दुनिया उठा के मैं
जी चाहता है भाग लूँ दुनिया उठा के मैं
होती है नींद में कहीं तश्कील-ए-ख़द्द-ओ-ख़ाल
उठता हूँ अपने ख़्वाब का चेहरा उठा के मैं
बा'द अज़ सदा-ए-कुन हुई तक़्सीम-ए-हस्त-ओ-बूद
फिरता था काएनात अकेला उठा के मैं
क्यूँकर न सहल हो मुझे राह-ए-दयार-ए-इश्क़
लाया हूँ दश्त-ए-नज्द का नक़्शा उठा के मैं
बढ़ने लगा था नश्शा-ए-तख़्लीक़-ए-आब ओ ख़ाक
वो चाक उठा के चल दिया कूज़ा उठा के मैं
है साअत-ए-विसाल के मलने पे मुनहसिर
कस सम्त भागता हूँ ये लम्हा उठा के मैं
क़ुर्बत-पसंद दिल की तबीअत में था तज़ाद
ख़ुश हो रहा हूँ हिज्र का सदमा उठा मैं
अब मुझ को एहतिमाम से कीजे सुपुर्द-ए-ख़ाक
उक्ता चुका हूँ जिस्म का मलबा उठा के मैं
अच्छा भला तो था तन-ए-तन्हा जहान में
पछता रहा हूँ ख़ल्क़ का बेड़ा उठा के मैं
'आज़र' मुझे मदीने से हिजरत का हुक्म था
सहरा में ले के आ गया ख़ेमा उठा के मैं
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उठने के लिए क़स्द किया मैं ने बला का
अब लोग ये कहते हैं मुक़द्दर से उठा मैं
पहले तो ख़द-ओ-ख़ाल बनाए सर-ए-क़िर्तास
फिर अपने ख़द-ओ-ख़ाल के अंदर से उठा मैं
इक और तरह मुझ पे खुली चश्म-ए-तमाशा
इक और तजल्ली के बराबर से उठा मैं
है तेरी मिरी ज़ात की यकताई बराबर
ग़ाएब से तो उभरा तो मुयस्सर से उठा मैं
क्या जाने कहाँ जाने की जल्दी थी दम-ए-फ़ज्र
सूरज से ज़रा पहले ही बिस्तर से उठा मैं
पथराने लगे थे मिरे आ'साब कोई दम
ख़ामोश निगाहों के बराबर से उठा मैं
इक आग मिरे जिस्म में महफ़ूज़ थी 'आज़र'
ख़स-खाना-ए-ज़ुलमात के अंदर से उठा मैं
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वो बहते दरिया की बे-करानी से डर रहा था
शदीद प्यासा था और पानी से डर रहा था
शदीद प्यासा था और पानी से डर रहा था
नज़र नज़र की यक़ीं-पसंदी पे ख़ुश थी लेकिन
बदन बदन की गुमाँ-रिसानी से डर रहा था
सभी को नींद आ चुकी थी यूँ तो परी से मिल कर
मगर वो इक तिफ़्ल जो कहानी से डर रहा था
लरज़ते होंटों से गिर पड़े थे हुरूफ़ इक दिन
दिल अपने जज़्बों की तर्जुमानी से डर रहा था
लुग़ात-ए-जाँ से कशीद करते हुए सुख़न को
मैं एक हर्फ़-ए-ग़लत मआ'नी से डर रहा था
जमा हुआ ख़ून है रगों में न जाने कब से
रुका हुआ ख़्वाब है रवानी से डर रहा था
वो बे-निशाँ है जिसे निशाँ की हवस थी 'आज़र'
वो राएगाँ है जो राएगानी से डर रहा था
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हवा ने इस्म कुछ ऐसा पढ़ा था
दिया दीवार पर चलने लगा था
दिया दीवार पर चलने लगा था
मैं सेहर-ए-ख़्वाब से उट्ठा तो देखा
कोई खिड़की में सूरज रख गया था
खड़ा था मुंतज़िर दहलीज़ पर मैं
मुझे इक साया मिलने आ रहा था
तिरे आने से ये उक़्दा खुला है
मैं अपने आप में रक्खा हुआ था
सभी लफ़्ज़ों से तस्वीरें बनाईं
मिरी पोरों में मंज़र रेंगता था
मुझे तेरे इरादों की ख़बर थी
सो गहरी नींद में भी जागता था
मैं जब मैदान ख़ाली कर के आया
मिरा दुश्मन अकेला रह गया था
सभी के हाथ में पत्थर थे 'आज़र'
हमारे हाथ में इक आईना था
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बोझ उठाए हुए दिन रात कहाँ तक जाता
ज़िंदगानी में तिरे साथ कहाँ तक जाता
ज़िंदगानी में तिरे साथ कहाँ तक जाता
मुख़्तसर ये कि मैं बोसा भी ग़नीमत समझा
यूँ भी दौरान-ए-मुलाक़ात कहाँ तक जाता
सुब्ह होते ही सभी घर को रवाना होंगे
क़िस्सा-ए-दौर-ए-ख़राबात कहाँ तक जाता
थक गया था मैं तिरे नाम को जपते जपते
ले के होंटों पे यही बात कहाँ तक जाता
चाँद तारे तो मिरे बस में नहीं हैं 'आज़र'
फूल लाया हूँ मिरा हाथ कहाँ तक जाता
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आँख में ख़्वाब ज़माने से अलग रक्खा है
अक्स को आइना-ख़ाने से अलग रक्खा है
अक्स को आइना-ख़ाने से अलग रक्खा है
घर में गुल-दान सजाए हैं तिरी आमद पर
और इक फूल बहाने से अलग रक्खा है
कुछ हवा में भी चलाने के लिए रक्खा जाए
इस लिए तीर निशाने से अलग रक्खा है
उस के होंटों को नहीं आँख को दी है तरजीह
प्यास को प्यास बुझाने से अलग रक्खा है
ग़ैर-मुमकिन है किसी और के हाथ आ जाए
वो ख़ज़ाना जो ख़ज़ाने से अलग रक्खा है
इक हवा सी कहीं बाँधी है छुपाने के लिए
इक तमाशा सा लगाने से अलग रक्खा है
ख़्वाब ही ख़्वाब में ता'मीर किया है 'आज़र'
घर को बुनियाद उठाने से अलग रक्खा है
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बढ़ा रहा है ये एहसास मेरी धड़कन को
घड़ी में सूई की रफ़्तार घट रही होगी
मैं जान लूँगा कि अब साँस घुटने वाला है
हरे दरख़्त से जब शाख़ कट रही होगी
नए सफ़र पे रवाना किया गया है तुम्हें
तुम्हारे पाँव से धरती लिपट रही होगी
ग़लत कहा था किसी ने ये गाँव वालों से
चलो कि शहर में ख़ैरात बट रही होगी
फ़लक की सम्त उछाली थी जल-परी मैं ने
सितारे हाथ में ले कर पलट रही होगी
बदन में फैल रही है ये काएनात 'आज़र'
हमारी आँख की पुतली सिमट रही होगी
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