Dilawar Ali Aazar

Dilawar Ali Aazar

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Dilawar Ali Aazar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Dilawar Ali Aazar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कमाल ये है मुझे देखती हैं वो आँखें मलाल ये है उन्हें देखना नहीं आता — Dilawar Ali Aazar
उस से मिलना तो उसे ईद-मुबारक कहना ये भी कहना कि मिरी ईद मुबारक कर दे — Dilawar Ali Aazar

Ghazal

लम्हा लम्हा वुसअत-ए-कौन-ओ-मकाँ की सैर की आ गया सो ख़ूब मैं ने ख़ाक-दाँ की सैर की एक लम्हे के लिए तन्हा नहीं होने दिया ख़ुद को अपने साथ रक्खा जिस जहाँ की सैर की तुझ से मिल कर आज अंदाज़ा हुआ है ज़िंदगी पहले जितनी की वो गोया राएगाँ की सैर की नींद से जागे हैं कोई ख़्वाब भी देखा है क्या देखा है तो बोलिए शब-भर कहाँ की सैर की थक गया था मैं बदन में रहते रहते एक दिन भाग निकला और जा कर आसमाँ की सैर की याद है इक एक गोशा नक़्श है दिल पर हनूज़ सैर तो वो है जो शहर-ए-दिल-बराँ की सैर की फूल हैरत से हमें देखा किए वक़्त-ए-विसाल गुल-बदन के साथ 'आज़र' गुलिस्ताँ की सैर की — Dilawar Ali Aazar
सात दरियाओं का पानी है मिरे कूज़े में बंद इक ताज़ा कहानी है मिरे कूज़े में तुम उसे पानी समझते हो तो समझो साहब ये समुंदर की निशानी है मिरे कूज़े में मेरे आबा ने जवानी में मुझे सौंपा था मेरे आबा की जवानी है मिरे कूज़े में देखने वालो नए नक़्श मिलेंगे तुम को सोचने वालो गिरानी है मिरे कूज़े में जाने किस ख़ाक से ये ज़र्फ़ हुआ है ता'मीर जाने किस घाट का पानी है मिरे कूज़े में आन की आन गुज़रता है ज़माना इस पर वक़्त की नक़्ल-ए-मकानी है मिरे कूज़े में चारों सम्तों में कोई शय भी अगर है मौजूद इस ने वो ला के गिरानी है मिरे कूज़े में क़र्ज़ है मुझ पे जो इक अक्स-ए-तमन्ना 'आज़र' उस ने क्या शक्ल बनानी है मिरे कूज़े में — Dilawar Ali Aazar
ख़ुद में खिलते हुए मंज़र से नुमूदार हुआ वो जज़ीरा जो समुंदर से नुमूदार हुआ मेरी तन्हाई ने पैदा किए साए घर में कोई दीवार कोई दर से नुमूदार हुआ चारों अतराफ़ मिरे आइने रक्खे गए थे मैं ही मैं अपने बराबर से नुमूदार हुआ आज की रात गुज़ारी है दिए ने मुझ में आज का दिन मिरे अंदर से नुमूदार हुआ क्या अजब नक़्श है वो नक़्श जो इस दुनिया के कहीं अंदर कहीं बाहरस नुमूदार हुआ एक शो'ले की लपक नूर में ढल कर आई एक किरदार बहत्तर से नुमूदार हुआ हक़ की पहचान हुई ख़ल्क़ को 'आज़र' उस वक़्त जब अली आप के बिस्तर से नुमूदार हुआ — Dilawar Ali Aazar
मुमकिन है कि मिलते कोई दम दोनों किनारे इक मौज के मुहताज थे हम दोनों किनारे यूँँ आँख झपकता नहीं बहता हुआ पानी मंज़र में न हो जाएँ बहम दोनों किनारे आबाद हमेशा ही रहेगा ये समुंदर रखते हैं मछेरों का भरम दोनों किनारे ता-उम्र किसी मौजा-ए-ख़ुश-रौ की हवस में बेदार रहे दम हमा-दम दोनों किनारे खुलती है यहाँ आ के मिरे ख़्वाब की वुसअ'त होते हैं मिरी आँख में ज़म दोनों किनारे ये फ़ासला मिट्टी से कभी तय नहीं होगा दरिया की हैं वुसअ'त पे क़सम दोनों किनारे सब सैर को निकलेंगे सर-ए-साहिल-ए-हर-ख़्वाब सय्याहों के चू मेंगे क़दम दोनों किनारे कश्ती की तरह उम्र ख़िज़र-गीर है 'आज़र' हस्ती के हैं मौजूद-ओ-अदम दोनों किनारे — Dilawar Ali Aazar
आग लग जाएगी इक दिन मिरी सरशारी को मैं जो देता हूँ हवा रूह की चिंगारी को वर्ना ये लोग कहाँ अपनी हदों में रहते मैं ने माक़ूल किया हाशिया-बर्दारी को ये परिंदे हैं कि दरवेश हैं ज़िंदानों के कुछ समझते ही नहीं अम्र-ए-गिरफ़्तारी को अब हमें ज़िंदगी करने में सुहूलत दी जाए खींच लाए हैं यहाँ तक तो गिराँ-बारी को एक तूफ़ान-ए-बला-ख़ेज़ ने मंज़र बदला पेड़ तय्यार हुए रस्म-ए-निगूँ-सारी को उस ने वो ज़हर हवाओं में मिलाया है कि अब कोंपलें सर न उठाएँगी नुमूदारी को कौन खींचेगा मिरे जिस्म की ज़ंजीर 'आज़र' कौन आसान करेगा मिरी दुश्वारी को — Dilawar Ali Aazar
मख़्फ़ी हैं अभी दिरहम-ओ-दीनार हमारे मिट्टी से निकल आएँगे अश्जार हमारे अल्फ़ाज़ से खींची गई तस्वीर-ए-दो-आलम आवाज़ में रक्खे गए आसार हमारे ज़ंगार किया जाता है आईना-ए-तख़लीक़ और नक़्श चले जाते हैं बेकार हमारे कुछ ज़ख़्म दिखा सकता है ये रौज़न-ए-दीवार कुछ भेद बता सकती है दीवार हमारे क्यूँँ चार अनासिर रहें पाबंद-ए-शब-ओ-रोज़ आज़ाद किए जाएँ गिरफ़्तार हमारे क्यूँँ शाम से वीरान किया जाता है हम को क्यूँँ बंद किए जाते हैं बाज़ार हमारे क्या आप से अब सख़्ती-ए-बे-जा की शिकायत जब आप हुए मालिक-ओ-मुख़्तार हमारे तहसीन-तलब रहते हैं ता-उम्र कि 'आज़र' पैदा ही नहीं होते तरफ़-दार हमारे — Dilawar Ali Aazar
कब तक फिरूंगा हाथ में कासा उठा के मैं जी चाहता है भाग लूँ दुनिया उठा के मैं होती है नींद में कहीं तश्कील-ए-ख़द्द-ओ-ख़ाल उठता हूँ अपने ख़्वाब का चेहरा उठा के मैं बा'द अज़ सदा-ए-कुन हुई तक़्सीम-ए-हस्त-ओ-बूद फिरता था काएनात अकेला उठा के मैं क्यूँँकर न सहल हो मुझे राह-ए-दयार-ए-इश्क़ लाया हूँ दश्त-ए-नज्द का नक़्शा उठा के मैं बढ़ने लगा था नश्शा-ए-तख़्लीक़-ए-आब ओ ख़ाक वो चाक उठा के चल दिया कूज़ा उठा के मैं है साअत-ए-विसाल के मलने पे मुनहसिर कस सम्त भागता हूँ ये लम्हा उठा के मैं क़ुर्बत-पसंद दिल की तबीअत में था तज़ाद ख़ुश हो रहा हूँ हिज्र का सदमा उठा मैं अब मुझ को एहतिमाम से कीजे सुपुर्द-ए-ख़ाक उक्ता चुका हूँ जिस्म का मलबा उठा के मैं अच्छा भला तो था तन-ए-तन्हा जहान में पछता रहा हूँ ख़ल्क़ का बेड़ा उठा के मैं 'आज़र' मुझे मदीने से हिजरत का हुक्म था सहरा में ले के आ गया ख़ेमा उठा के मैं — Dilawar Ali Aazar
यूँँ दीदा-ए-ख़ूँ-बार के मंज़र से उठा मैं तूफ़ान उठा मुझ में समुंदर से उठा मैं उठने के लिए क़स्द किया मैं ने बला का अब लोग ये कहते हैं मुक़द्दर से उठा मैं पहले तो ख़द-ओ-ख़ाल बनाए सर-ए-क़िर्तास फिर अपने ख़द-ओ-ख़ाल के अंदर से उठा मैं इक और तरह मुझ पे खुली चश्म-ए-तमाशा इक और तजल्ली के बराबर से उठा मैं है तेरी मिरी ज़ात की यकताई बराबर ग़ाएब से तो उभरा तो मुयस्सर से उठा मैं क्या जाने कहाँ जाने की जल्दी थी दम-ए-फ़ज्र सूरज से ज़रा पहले ही बिस्तर से उठा मैं पथराने लगे थे मिरे आ'साब कोई दम ख़ामोश निगाहों के बराबर से उठा मैं इक आग मिरे जिस्म में महफ़ूज़ थी 'आज़र' ख़स-खाना-ए-ज़ुलमात के अंदर से उठा मैं — Dilawar Ali Aazar
मैं सुर्ख़ फूल को छू कर पलटने वाला था वो जज़्ब था कि मिरा जिस्म कटने वाला था उस एक रंग से पैदा हुई ये क़ौस-ए-क़ुज़ह वो एक रंग जो मंज़र से हटने वाला था मिरे क़रीब ही इक ताक़ में किताबें थीं मगर ये ध्यान कहीं और बटने वाला था अजीब शान से उतरी थी धूप ख़्वाहिश की मैं अपने साए से जैसे लिपटने वाला था तवील गुफ़्तुगू होती रही सितारों से निगार-ख़ाना-ए-हस्ती उलटने वाला था ज़मीं पे आमद-ए-आदम का शोर बरपा हुआ वगरना रिज़्क़ फ़रिश्तों में बटने वाला था ख़ुदा का शुक्र है नश्शा उतर गया मेरा कि मैं सुबू में समुंदर उलटने वाला था लपक रही थी कोई आग इस तरफ़ 'आज़र' मैं उस से दूर बहुत दूर हटने वाला था — Dilawar Ali Aazar
वो बहते दरिया की बे-करानी से डर रहा था शदीद प्यासा था और पानी से डर रहा था नज़र नज़र की यक़ीं-पसंदी पे ख़ुश थी लेकिन बदन बदन की गुमाँ-रिसानी से डर रहा था सभी को नींद आ चुकी थी यूँँ तो परी से मिल कर मगर वो इक तिफ़्ल जो कहानी से डर रहा था लरज़ते होंटों से गिर पड़े थे हुरूफ़ इक दिन दिल अपने जज़्बों की तर्जुमानी से डर रहा था लुग़ात-ए-जाँ से कशीद करते हुए सुख़न को मैं एक हर्फ़-ए-ग़लत मआ'नी से डर रहा था जमा हुआ ख़ून है रगों में न जाने कब से रुका हुआ ख़्वाब है रवानी से डर रहा था वो बे-निशाँ है जिसे निशाँ की हवस थी 'आज़र' वो राएगाँ है जो राएगानी से डर रहा था — Dilawar Ali Aazar