KHud men khilte hue manzar se numoodaar hua | ख़ुद में खिलते हुए मंज़र से नुमूदार हुआ

  - Dilawar Ali Aazar

ख़ुद में खिलते हुए मंज़र से नुमूदार हुआ
वो जज़ीरा जो समुंदर से नुमूदार हुआ

मेरी तन्हाई ने पैदा किए साए घर में
कोई दीवार कोई दर से नुमूदार हुआ

चारों अतराफ़ मिरे आइने रक्खे गए थे
मैं ही मैं अपने बराबर से नुमूदार हुआ

आज की रात गुज़ारी है दिए ने मुझ में
आज का दिन मिरे अंदर से नुमूदार हुआ

क्या 'अजब नक़्श है वो नक़्श जो इस दुनिया के
कहीं अंदर कहीं बाहर से नुमूदार हुआ

एक शो'ले की लपक नूर में ढल कर आई
एक किरदार बहत्तर से नुमूदार हुआ

हक़ की पहचान हुई ख़ल्क़ को 'आज़र' उस वक़्त
जब अली आप के बिस्तर से नुमूदार हुआ

  - Dilawar Ali Aazar

Alone Shayari

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