Adil Mansuri

Adil Mansuri

@adil-mansuri

Adil Mansuri shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Adil Mansuri's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

19

Content

44

Likes

629

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal

Sher

तस्वीर में जो क़ैद था वो शख़्स रात को ख़ुद ही फ़्रेम तोड़ के पहलू में आ गया — Adil Mansuri
तुम को दावा है सुख़न-फ़हमी का जाओ 'ग़ालिब' के तरफ़-दार बनो — Adil Mansuri
हम को गाली के लिए भी लब हिला सकते नहीं ग़ैर को बोसा दिया तो मुँह से दिखला कर दिया — Adil Mansuri
नींद भी जागती रही पूरे हुए न ख़्वाब भी सुब्ह हुई ज़मीन पर रात ढली मज़ार में — Adil Mansuri
ख़ुद-ब-ख़ुद शाख़ लचक जाएगी फल से भरपूर तो हो लेने दो — Adil Mansuri
मुझे पसंद नहीं ऐसे कारोबार में हूँ ये जब्र है कि मैं ख़ुद अपने इख़्तियार में हूँ — Adil Mansuri
फिर बालों में रात हुई फिर हाथों में चाँद खिला — Adil Mansuri
तू किस के कमरे में थी मैं तेरे कमरे में था — Adil Mansuri
क्यूँँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो तन्हा हूँ आज मैं ज़रा घर तक तो साथ दो — Adil Mansuri
कोई ख़ुद-कुशी की तरफ़ चल दिया उदासी की मेहनत ठिकाने लगी — Adil Mansuri
ख़्वाहिश सुखाने रक्खी थी कोठे पे दोपहर अब शाम हो चली मियाँ देखो किधर गई — Adil Mansuri
दरिया की वुसअतों से उसे नापते नहीं तन्हाई कितनी गहरी है इक जाम भर के देख — Adil Mansuri
खिड़की ने आँखें खोली दरवाज़े का दिल धड़का — Adil Mansuri
दरवाज़ा खटखटा के सितारे चले गए ख़्वाबों की शाल ओढ़ के मैं ऊँघता रहा — Adil Mansuri
कब तक पड़े रहोगे हवाओं के हाथ में कब तक चलेगा खोखले शब्दों का कारोबार — Adil Mansuri
दरिया के किनारे पे मिरी लाश पड़ी थी और पानी की तह में वो मुझे ढूँड रहा था — Adil Mansuri
फूलों की सेज पर ज़रा आराम क्या किया उस गुल-बदन पे नक़्श उठ आए गुलाब के — Adil Mansuri
जो चुप-चाप रहती थी दीवार पर वो तस्वीर बातें बनाने लगी — Adil Mansuri
ऐसे डरे हुए हैं ज़माने की चाल से घर में भी पाँव रखते हैं हम तो सँभाल कर — Adil Mansuri
ज़रा देर बैठे थे तन्हाई में तिरी याद आँखें दुखाने लगी — Adil Mansuri

Ghazal

पहलू के आर-पार गुज़रता हुआ सा हो इक शख़्स आइने में उतरता हुआ सा हो जीता हुआ सा हो कभी मरता हुआ सा हो इक शहर अपने आप से डरता हुआ सा हो सारे कबीरा आप ही करता हुआ सा हो इल्ज़ाम दूसरे ही पे धरता हुआ सा हो हर इक नया ख़याल जो टपके है ज़ेहन से यूँँ लग रहा है जैसे कि बरता हुआ सा हो क़ैलूला कर रहे हों किसी नीम के तले मैदाँ में रख़्श-ए-उम्र भी चरता हुआ सा हो माशूक़ ऐसा ढूँडिए क़हतुर-रिजाल में हर बात में अगरता मगरता हुआ सा हो फिर बा'द में वो क़त्ल भी कर दे तो हर्ज क्या लेकिन वो पहले प्यार भी करता हुआ सा हो गर दाद तू न दे न सही गालियाँ सही अपना भी कोई ऐब हुनरता हुआ सा हो — Adil Mansuri
आधों की तरफ़ से कभी पौनों की तरफ़ से आवाज़े कसे जाते हैं बौनों की तरफ़ से हैरत से सभी ख़ाक-ज़दा देख रहे हैं हर रोज़ ज़मीं घटती है कोनों की तरफ़ से आँखों में लिए फिरते हैं इस दर-बदरी में कुछ टूटे हुए ख़्वाब खिलौनों की तरफ़ से फिर कोई असा दे कि वो फुंकारते निकले फिर अज़दहे फ़िरऔन के टोनों की तरफ़ से तू वहम-ओ-गुमाँ से भी परे देता है सब को हो जाता है पल भर में न होनों की तरफ़ से बातों का कोई सिलसिला जारी हो किसी तौर ख़ामोशी ही ख़ामोशी है दोनों की तरफ़ से फिर बा'द में दरवाज़ा दिखा देते हैं 'आदिल' पहले वो उठाते हैं बिछौनों की तरफ़ से — Adil Mansuri
दरवाज़ा बंद देख के मेरे मकान का झोंका हवा का खिड़की के पर्दे हिला गया वो जान-ए-नौ-बहार जिधर से गुज़र गया पेड़ों ने फूल पत्तों से रस्ता छुपा लिया उस के क़रीब जाने का अंजाम ये हुआ मैं अपने-आप से भी बहुत दूर जा पड़ा अँगड़ाई ले रही थी गुलिस्ताँ में जब बहार हर फूल अपने रंग की आतिश में जल गया काँटे से टूटते हैं मिरे अंग अंग में रग रग में चाँद जलता हुआ ज़हर भर गया आँखों ने उस को देखा नहीं इस के बावजूद दिल उस की याद से कभी ग़ाफ़िल नहीं रहा दरवाज़ा खटखटा के सितारे चले गए ख़्वाबों की शाल ओढ़ के मैं ऊँघता रहा शब चाँदनी की आँच में तप कर निखर गई सूरज की जलती आग में दिन ख़ाक हो गया सड़कें तमाम धूप से अँगारा हो गईं अंधी हवाएँ चलती हैं इन पर बरहना-पा वो आए थोड़ी देर रुके और चले गए 'आदिल' मैं सर झुकाए हुए चुप खड़ा रहा — Adil Mansuri
एक क़तरा अश्क का छलका तो दरिया कर दिया एक मुश्त-ए-ख़ाक जो बिखरी तो सहरा कर दिया मेरे टूटे हौसले के पर निकलते देख कर उस ने दीवारों को अपनी और ऊँचा कर दिया वारदात-ए-क़ल्ब लिक्खी हम ने फ़र्ज़ी नाम से और हाथों-हाथ उस को ख़ुद ही ले जा कर दिया उस की नाराज़ी का सूरज जब सवा नेज़े पे था अपने हर्फ़-ए-इज्ज़ ही ने सर पे साया कर दिया दुनिया भर की ख़ाक कोई छानता फिरता है अब आप ने दर से उठा कर कैसा रुस्वा कर दिया अब न कोई ख़ौफ़ दिल में और न आँखों में उमीद तू ने मर्ग-ए-ना-गहाँ बीमार अच्छा कर दिया भूल जा ये कल तिरे नक़्श-ए-क़दम थे चाँद पर देख उन हाथों को किस ने आज कासा कर दिया हम तो कहने जा रहे थे हम्ज़ा-ए-ये वस्सलाम बीच में उस ने अचानक नून-ग़ुन्ना कर दिया हम को गाली के लिए भी लब हिला सकते नहीं ग़ैर को बोसा दिया तो मुँह से दिखला कर दिया तीरगी की भी कोई हद होती है आख़िर मियाँ सुर्ख़ परचम को जला कर ही उजाला कर दिया बज़्म में अहल-ए-सुख़न तक़्तीअ' फ़रमाते रहे और हम ने अपने दिल का बोझ हल्का कर दिया जाने किस के मुंतज़िर बैठे हैं झाड़ू फेर कर दिल से हर ख़्वाहिश को 'आदिल' हम ने चलता कर दिया — Adil Mansuri
फैले हुए हैं शहर में साए निढाल से जाएँ कहाँ निकल के ख़यालों के जाल से मशरिक़ से मेरा रास्ता मग़रिब की सम्त था उस का सफ़र जुनूब की जानिब शुमाल से कैसा भी तल्ख़ ज़िक्र हो कैसी भी तुर्श बात उन की समझ में आएगी गुल की मिसाल से चुप-चाप बैठे रहते हैं कुछ बोलते नहीं बच्चे बिगड़ गए हैं बहुत देख-भाल से रंगों को बहते देखिए कमरे के फ़र्श पर किरनों के वार रोकिए शीशे की ढाल से आँखों में आँसुओं का कहीं नाम तक नहीं अब जूते साफ़ कीजिए उन के रुमाल से चेहरा बुझा बुझा सा परेशान ज़ुल्फ़ ज़ुल्फ़ अल्लाह दुश्मनों को बचाए वबाल से फिर पानियों में नुक़रई साए उतर गए फिर रात जगमगा उठी चाँदी के थाल से — Adil Mansuri
चारों तरफ़ से मौत ने घेरा है ज़ीस्त को और उस के साथ हुक्म कि अब ज़िंदगी करो बाहर गली में शोर है बरसात का सुनो कुंडी लगा के आज तो घर में पड़े रहो छोड़ आए किस की छत पे जवाँ-साल चाँद को ख़ामोश किस लिए हो सितारो जवाब दो क्यूँँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो तन्हा हूँ आज मैं ज़रा घर तक तो साथ दो जिस ने भी मुड़ के देखा वो पत्थर का हो गया नज़रें झुकाए दोस्तो चुप चुप चले चलो अल्लाह रक्खे तेरी सहर जैसी कम-सिनी दिल काँपता है जब भी तू आती है शाम को वीराँ चमन पे रोई है शबनम तमाम रात ऐसे में कोई नन्ही कली मुस्कुराए तो 'आदिल' हवाएँ कब से भी देती हैं दस्तकें जल्दी से उठ के कमरे का दरवाज़ा खोल दो — Adil Mansuri