tu kis ke kamre mein thi | तू किस के कमरे में थी

  - Adil Mansuri

तू किस के कमरे में थी
मैं तेरे कमरे में था

  - Adil Mansuri

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    जीता है सिर्फ़ तेरे लिए कौन मर के देख
    इक रोज़ मेरी जान ये हरकत भी कर के देख

    मंज़िल यहीं है आम के पेड़ों की छाँव में
    ऐ शहसवार घोड़े से नीचे उतर के देख

    टूटे पड़े हैं कितने उजालों के उस्तुख़्वाँ
    साया-नुमा अँधेरे के अंदर उतर के देख

    फूलों की तंग-दामनी का तज़्किरा न कर
    ख़ुशबू की तरह मौज-ए-सबा में बिखर के देख

    तुझ पर खुलेंगे मौत की सरहद के रास्ते
    हिम्मत अगर है उस की गली से गुज़र के देख

    दरिया की वुसअतों से उसे नापते नहीं
    तन्हाई कितनी गहरी है इक जाम भर के देख
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    Adil Mansuri
    मुझे पसंद नहीं ऐसे कारोबार में हूँ
    ये जब्र है कि मैं ख़ुद अपने इख़्तियार में हूँ

    हुदूद-ए-वक़्त से बाहर अजब हिसार में हूँ
    मैं एक लम्हा हूँ सदियों के इंतिज़ार में हूँ

    अभी न कर मिरी तश्कील मुझ को नाम न दे
    तिरे वजूद से बाहर में किस शुमार में हूँ

    मैं एक ज़र्रा मिरी हैसियत ही क्या है मगर
    हवा के साथ हूँ उड़ते हुए ग़ुबार में हूँ

    बस आस-पास ये सूरज है और कुछ भी नहीं
    महक रहा तो हूँ लेकिन मैं रेगज़ार में हूँ
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    Adil Mansuri
    तुम को दावा है सुख़न-फ़हमी का
    जाओ 'ग़ालिब' के तरफ़-दार बनो
    Adil Mansuri
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    ज़मीं छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा
    अँधेरों के अंदर उतर जाऊँगा

    मिरी पत्तियाँ सारी सूखी हुईं
    नए मौसमों में बिखर जाऊँगा

    अगर आ गया आइना सामने
    तो अपने ही चेहरे से डर जाऊँगा

    वो इक आँख जो मेरी अपनी भी है
    न आई नज़र तो किधर जाऊँगा

    वो इक शख़्स आवाज़ देगा अगर
    मैं ख़ाली सड़क पर ठहर जाऊँगा

    पलट कर न पाया किसी को अगर
    तो अपनी ही आहट से डर जाऊँगा

    तिरी ज़ात में साँस ली है सदा
    तुझे छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा
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    Adil Mansuri
    क्यूँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो
    तन्हा हूँ आज मैं ज़रा घर तक तो साथ दो
    Adil Mansuri
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