Ahmad Kamal Parvazi

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Ahmad Kamal Parvazi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ahmad Kamal Parvazi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

तुम मिरे साथ हो ये सच तो नहीं है लेकिन मैं अगर झूट न बोलूँ तो अकेला हो जाऊँ — Ahmad Kamal Parvazi
मैं इस लिए भी तेरे फ़न की क़द्र करता हूँ तू झूठ बोल के आँसू निकाल लेता है — Ahmad Kamal Parvazi

Ghazal

मैं रंग-ए-आसमाँ कर के सुनहरी छोड़ देता हूँ वतन की ख़ाक ले कर एक मुट्ठी छोड़ देता हूँ ये क्या कम है कि हक़्क़-ए-ख़ुद-परस्ती छोड़ देता हूँ तुम्हारा नाम आता है तो कुर्सी छोड़ देता हूँ मैं रोज़-ए-जश्न की तफ़्सील लिख कर रख तो लेता हूँ मगर उस जश्न की तारीख़ ख़ाली छोड़ देता हूँ बहुत मुश्किल है मुझ से मय-परस्ती कैसे छूटेगी मगर हाँ आज से फ़िर्का-परस्ती छोड़ देता हूँ ख़ुद अपने हाथ से रस्म-ए-विदाई कर तो दी पर अब कोई बारात आती है तो बस्ती छोड़ देता हूँ तुम्हारे वस्ल का जिस दिन कोई इम्कान होता है मैं उस दिन रोज़ा रखता हूँ बुराई छोड़ देता हूँ हुकूमत मिल गई तो उन का कूचा छूट जाएगा इसी नुक़्ते पे आ कर बादशाही छोड़ देता हूँ मुबारक हो तुझे सद-आफ़रीं ऐ शान-ए-महरूमी तिरे पहलू में आ के घर-गृहस्ती छोड़ देता हूँ — Ahmad Kamal Parvazi
ये गर्म रेत ये सहरा निभा के चलना है सफ़र तवील है पानी बचा के चलना है बस इस ख़याल से घबरा के छट गए सब लोग ये शर्त थी कि क़तारें बना के चलना है वो आए और ज़मीं रौंद कर चले भी गए हमें भी अपना ख़सारा भुला के चलना है कुछ ऐसे फ़र्ज़ भी ज़िम्में हैं ज़िम्मे-दारों पर जिन्हें हमारे दिलों को दुखा के चलना है शनासा ज़ेहनों पे ता'ने असर नहीं करते तू अजनबी है तुझे ज़हर खा के चलना है वो दीदा-वर हो कि शाएर कि मसख़रा कोई यहाँ सभी को तमाशा दिखा के चलना है वो अपने हुस्न की ख़ैरात देने वाले हैं तमाम जिस्म को कासा बना के चलना है — Ahmad Kamal Parvazi
तन्हाई से बचाव की सूरत नहीं करूँँ मर जाऊँ क्या किसी से मोहब्बत नहीं करूँँ सू-ए-फ़लक हवाई सफ़र है तो क्या हुआ डर जाऊँ माहताब की सूरत नहीं करूँँ आँखें हैं या शराब के साग़र भरे हुए पी जाऊँ क्या ख़याल-ए-शरीअत नहीं करूँँ क़ब्ज़े में उन के शहर-ए-तिलिस्मात ही सही खो जाऊँ क्या ख़ुदा की इबादत नहीं करूँँ जब तय हुआ कि रौशनी परवरदिगार है पहलू बचाऊँ उस की इता'अत नहीं करूँँ बज़्म-ए-सुख़न-तराज़ में नाकाम हों तो क्या चिल्लाऊँ अपने फ़न की हिफ़ाज़त नहीं करूँँ वो आ गया 'कमाल' की क़ीमत के आस-पास बिक जाऊँ अपने सच की हिफ़ाज़त नहीं करूँँ — Ahmad Kamal Parvazi