अपने माँ-बाप के कंधों से उतरना सीखो

दूसरे दौर की तैयारियाँ करना सीखो

होनहारो ये तक़ाज़ा है कि ता'लीम के बा'द
वक़्त के साथ रहो जेब कतरना सीखो

ये तो अच्छा है कि हक़ मार रहे हो लेकिन
इस से क्या होगा अभी और निखरना सीखो

क़त्ल होने की सिफ़त बा'द के अस्बाक़ में है
पहले ख़ंजर की कसौटी पे उतरना सीखो

हम तो हर वक़्त महाज़ों पे रहा करते हैं
तुम भले लोग हो बा-क़ाएदा मरना सीखो

— Ahmad Kamal Parvazi

More by Ahmad Kamal Parvazi

Other ghazal from the same pen

See all from Ahmad Kamal Parvazi →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling