YAWAR ALI

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@Yawar

YAWAR ALI shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in YAWAR ALI's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

अब वो ही दिवानों सा मुझे ढूँढ़ रहा है हँसता था कभी जो मुझे दीवाना समझ कर — YAWAR ALI
तुझे मैं भूल तो जाऊँ मगर ये भी बता कैसे हर इक एहसास ज़िंदा है हर इक अरमान बाक़ी है — YAWAR ALI
अँधेरों का न रह जाए कहीं नाम-ओ-निशाँ बाक़ी चलो आओ कि हम मिल कर मनाएँ ऐसे दीवाली — YAWAR ALI
आप के बा'द कोई आप के जैसा न मिला ख़ूब ढूँढी है दवा हम ने दवा-ख़ानों में — YAWAR ALI
ख़ूब मालूम था अंजाम-ए-मुहब्बत फिर भी लोग इस आग के दरिया में उतर कर डूबे — YAWAR ALI
इल्म ये हासिल नहीं होगा किताबों से तुम्हें दोस्तो सीखोगे चलना ठोकरें खाने के बा'द — YAWAR ALI
मैं अपने मन के मंदिर में कोई मूरत तो रख लेता तेरा पर्यायवाची पर कहाँ से ढूँढ़ कर लाऊँ — YAWAR ALI
क्या ये भी किसी जंग के ऐलान से कम है हम सह के तेरे ज़ुल्म-ओ-सितम घूम रहे हैं — YAWAR ALI
देर तक मैं तुझे सीने से लगाए रक्खूँ कोई इस वक़्त की रफ़्तार को धीमा कर दे — YAWAR ALI
झेलने होंगे तुम को ये मौसम सभी ज़िंदगी बस नहीं फ़रवरी की तरह — YAWAR ALI
गर हाथ कोई थामने वाला हो सफ़र में तपता हुआ सहरा भी बयाबाँ नहीं लगता — YAWAR ALI
क़लम हाथों में लकड़ी का कलर तन पे सियाही के न जाने खो गए जा कर कहाँ दिन बादशाही के — YAWAR ALI
बड़ी मुश्किल से होती है मुकम्मल इक ग़ज़ल "यावर" मियाँ, है राह इतनी भी नहीं आसान ग़ज़लों की — YAWAR ALI

Ghazal

दियों के नीचे उदास बैठे ज़िया की चाहत में आम चेहरे नसीब पे अपने रो रहे हैं ग़मों में लिपटे तमाम चेहरे कई दरख़्तों पे फूल खिलते हैं दौर-ए-बाद-ए-शबाब में भी हमेशा दिखते नहीं दुखी ही दुखों में लिपटे तमाम चेहरे रहेगी हरदम न बेरुख़ी ही ढलेगी शब भी सहर भी होगी बहाल हो जाएँगे तअल्लुक़ करेंगे जब एहतिराम चेहरे क़रीब होकर भी बारहा रुख़ कभी को रहते हैं अजनबी ही कभी बना लेते हैं ठिकाना दिलों के अंदर अनाम चेहरे मुशायरों को तो ख़ुद अदीबों ने इक तमाशा बना दिया है कहाँ ये गाने-बजाने वाले कहाँ वो अहल-ए-कलाम चेहरे ख़बर-नवीसों के दल नहीं हैं ये ज़र-ख़रीदों की टोलियाँ हैं जिधर भी देखो उधर झुके हैं बदों के आगे ग़ुलाम चेहरे सियाह-बख़्ती पे आज अपनी यूँँ ही सहाफ़त न रो रही है हलाल चेहरों को ओढ़े बैठे हैं मजलिसों में हराम चेहरे — YAWAR ALI
जहालत के किसी युग में नहीं हारे हैं अध्यापक चमकते हैं जो हर मौसम में वो तारे हैं अध्यापक रवानी के बिना पानी कभी दरिया नहीं बनता अगर हम आब हैं तो आब के धारे हैं अध्यापक वो चाहे मैथ के हों आर्ट के हों या हों इंग्लिश के हमें अपने तमामी जान से प्यारे हैं अध्यापक शब-ए-दैजूर में भी जिन की रौनक़ कम नहीं होती ज़माने के उजालों में वो उजियारे हैं अध्यापक अकेले मंज़िल-ए-मक़सूद पे हम कैसे पहुँचेंगे हमारी मंज़िल-ए-मक़सद के गलियारे हैं अध्यापक यूँँ ही पहुँचा नहीं है इल्म का पैग़ाम घर-घर में पयाम-ए-इल्म के दुनिया में हरकारे हैं अध्यापक हर इक क़स्र-ए-जहालत भरभरा कर ढह गया यावर अँधेरों के नगर में जब भी ललकारे हैं अध्यापक — YAWAR ALI
ग़ज़ल है क़ाफ़ियों से क़ाफ़िए हैं जान ग़ज़लों की बिना इन के गली हो जाएगी वीरान ग़ज़लों की कहीं मतला कहीं मक़्ता कहीं आता तख़ल्लुस है बढ़ाते हैं ये सब बज़्म-ए-अदब में शान ग़ज़लों की कई सिन्फ़ें हैं जैसे मरसिया दोहा रुबाई गीत अलग ही है मगर साहित्य में पहचान ग़ज़लों की रदीफ़ों को मनाओ गर क़वाफ़ी रूठ जाते हैं बड़ी मुश्किल से बनती है सुरीली तान ग़ज़लों की ख़ुशी का दर्द का या हो कोई मौज़ूअ दुनिया का सहारा है बनी सब के लिए दूकान ग़ज़लों की बहुत से इंक़िलाबों में इन्हों ने जान फूँकी है तुम्हें क्या क्या बताएँ ख़ूबियाँ बे-जान ग़ज़लों की बड़ी मुश्किल से होती है मुकम्मल इक ग़ज़ल 'यावर' मियाँ है राह इतनी भी नहीं आसान ग़ज़लों की — YAWAR ALI
भले कामों पे बदगोई की चुनरी डाल देते हैं सियासी लोग अच्छाई पे मिट्टी डाल देते हैं बड़े किरदार भी बिकते हैं लालच की दुकानों पर बुरे जब जेब में नोटों की गड्डी डाल देते हैं बहुत आसाँ है झूठे मज़हबी लोगों को लड़वाना अगर कुत्ते लड़ाना हों तो हड्डी डाल देते हैं उतर जाते हैं ले कर कश्तियाँ जो चढ़ते दरिया में वही तूफ़ान के पैरों में बेड़ी डाल देते हैं मदद की मत रखो उम्मीद ऐसे रहनुमाओं से भिकारी के जो कासे में डकैती डाल देते हैं बहुत मजबूर हो जाते हैं जब माँ-बाप ऐ यावर गले में अपने बच्चों के ही रस्सी डाल देते हैं — YAWAR ALI
बेबसों का जो मदद-गार नहीं हो सकता वो किसी क़ौम का सरदार नहीं हो सकता ऐ बशर तू किसी इंसान की क़िस्मत पढ़ ले तू कभी इतना समझदार नहीं हो सकता हम हैं दरिया के किनारों से यूँँ ही तड़पेंगे अपना मिलना मेरे दिलदार नहीं हो सकता ये भी मुमकिन है मेरे यार ग़लत हो तू ही हर दफ़ा मैं ही ख़ता-वार नहीं हो सकता सल्तनत होगी तेरी सब से कुशादा लेकिन ऐ अदू तू मेरा मुख़्तार नहीं हो सकता मैं ने माना कि मुहब्बत है बहुत कुछ लेकिन प्यार हर चीज़ मेरे यार नहीं हो सकता इस को पढ़ना है तो इस का तुझे होना होगा दिल किसी प्रेस का अख़बार नहीं हो सकता — YAWAR ALI
सियासी छाँव में यूँँ जुर्म का पौधा पनपता है ख़ुशी से जैसे माँ की गोद में बच्चा पनपता है कमी में इस तरह कोई कमी सर-सब्ज़ होती है बदन के ज़ख़्म में जैसे कोई कीड़ा पनपता है उसे बेहतर पता होता है जंगें कैसे लड़नी हैं शिकस्तों से नसीहत पा के जो चेहरा पनपता है कोई मुश्किल जवाँ होती नहीं है इत्तिला कर के मुसीबत का शजर दायम ही बे-मौक़ा पनपता है बदी की पौध दिल के खेत में उगती है ऐसे ही किसी फ़स्ल-ए-रबी में जिस तरह बथुआ पनपता है ख़ुदी से लड़ के जी पाना कहाँ आसान है इतना बड़ी मुश्किल से दुनिया में कोई मुझ सा पनपता है — YAWAR ALI
मुसीबत में भी मेरी ये समझदारी नहीं जाती ख़फ़ा कितना भी होऊँ नर्म-गुफ़्तारी नहीं जाती कोई अपना ग़लत हो गर तो लहजा नर्म रहता है ग़लत तो है मगर मुझ से ये बीमारी नहीं जाती बड़ी मग़रूर आदत है ग़मों में मुस्कुराने की मेरी नस नस में बहती ये अदाकारी नहीं जाती कोई उम्मीद जब बचती नहीं झुकना ही पड़ता है किसी से यूँँ ही कोई सल्तनत हारी नहीं जाती जहाँ भी फ़ायदा देखें झुका देते हैं सर अपने ये आदत आज भी लोगों की दरबारी नहीं जाती हसद की आग में सब जल रहे हैं एक दूजे से न जाने क्यूँँ दिलों से ये महामारी नहीं जाती लुटा हूँ बारहा मैं इश्क़ के जिन रहगुज़ारों पर उन्हीं राहों से मेरी आज भी यारी नहीं जाती — YAWAR ALI

Nazm

दिसम्बर नया साल आने की है तो ख़ुशी पर दिसम्बर के जाने का ग़म भी बहुत है वो मंज़र हसीं आँख में तैरते हैं दरख़्तों ने फूलों के ज़ेवर थे पहने गुलाबों पे जोबन की सुर्ख़ी चढ़ी थी ज़मीनों पे शबनम के मोती थे बिखरे हवाओं से कोहरा गले मिल रहा था पहाड़ों की गोदी से नीचे उतर कर ज़मीनों पे दरिया सफ़र कर रहा था किसी मस्तमौला गुलू-कार जैसा तरन्नुम में झरना ग़ज़ल पढ़ रहा था परिंदों का बुस्तान महका रहे थे गुल-ए-तर ख़ियाबान महका रहे थे कड़ाके की सर्दी में भी रुत जवाँ थी ख़यालों को अरमान महका रहे थे जिधर भी उठा कर नज़र देखता था मुहब्बत से लबरेज़ थे सारे मंज़र ज़माने की हर शय हसीं लग रही थी गुल-ए-इश्क़ जब मेरे दिल में खिला था दिसंबर के जाने का यूँँ ही न ग़म है मुझे वो दिसम्बर के मह में मिला था नया साल आने की है तो ख़ुशी पर दिसम्बर के जाने का ग़म भी बहुत है — YAWAR ALI