जान कर उस पे दिल-ओ-जान हैं हारे हम ने
इश्क़ में ख़ुद ही किए हैं ये ख़सारे हम ने
हम को मालूम है एहसास-ए-जुदाई क्या है
लोग खोए हैं कई जान से प्यारे हम ने
इश्क़ के मारों को समझाना पड़ा है महँगा
और भड़का दिए हैं बुझते शरारे हम ने
तब कहीं जा के हमें तख़्त हुआ है हासिल
बारहा जंग के मैदान हैं हारे हम ने
सो गए भूक की शिद्दत से शिकम था
में हम
वक़्त ऐसे भी कई बार गुज़ारे हम ने
बचपना लिपटा है पैवंद लगे कपड़ों में
बख़्त से पाए यही चाँद-सितारे हम ने
— YAWAR ALI















