बेबसों का जो मदद-गार नहीं हो सकता
वो किसी क़ौम का सरदार नहीं हो सकता
ऐ बशर तू किसी इंसान की क़िस्मत पढ़ ले
तू कभी इतना समझदार नहीं हो सकता
हम हैं दरिया के किनारों से यूँ ही तड़पेंगे
अपना मिलना मेरे दिलदार नहीं हो सकता
ये भी मुमकिन है मेरे यार ग़लत हो तू ही
हर दफ़ा मैं ही ख़ता-वार नहीं हो सकता
सल्तनत होगी तेरी सब से कुशादा लेकिन
ऐ अदू तू मेरा मुख़्तार नहीं हो सकता
मैं ने माना कि मुहब्बत है बहुत कुछ लेकिन
प्यार हर चीज़ मेरे यार नहीं हो सकता
इस को पढ़ना है तो इस का तुझे होना होगा
दिल किसी प्रेस का अख़बार नहीं हो सकता
— YAWAR ALI















