बिक गए मेरे खेत मुट्ठी-भर

रह गई सिर्फ़ रेत मुट्ठी-भर

शहर की भूक खा गई धरती
हैं बचे सिर्फ़ खेत मुट्ठी-भर

अब कहाँ तक वो तन्हा जागेंगे
जो बशर हैं सचेत मुट्ठी-भर

सीख लो थोड़ा जादू-टोना भी
हर नगर में हैं प्रेत मुट्ठी-भर

जा रही है फिसलती हाथों से
ज़िंदगी क्या है रेत मुट्ठी-भर

नेक इंसान यूँ हैं दुनिया में
जैसे मोती हों श्वेत मुट्ठी-भर

— YAWAR ALI

More by YAWAR ALI

Other ghazal from the same pen

See all from YAWAR ALI →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling