ye garm ret ye sehra nibha ke chalna hai | ये गर्म रेत ये सहरा निभा के चलना है

  - Ahmad Kamal Parvazi

ये गर्म रेत ये सहरा निभा के चलना है
सफ़र तवील है पानी बचा के चलना है

बस इस ख़याल से घबरा के छट गए सब लोग
ये शर्त थी कि क़तारें बना के चलना है

वो आए और ज़मीं रौंद कर चले भी गए
हमें भी अपना ख़सारा भुला के चलना है

कुछ ऐसे फ़र्ज़ भी ज़िम्में हैं ज़िम्मे-दारों पर
जिन्हें हमारे दिलों को दुखा के चलना है

शनासा ज़ेहनों पे ताने असर नहीं करते
तू अजनबी है तुझे ज़हर खा के चलना है

वो दीदा-वर हो कि शाएर कि मसख़रा कोई
यहाँ सभी को तमाशा दिखा के चलना है

वो अपने हुस्न की ख़ैरात देने वाले हैं
तमाम जिस्म को कासा बना के चलना है

  - Ahmad Kamal Parvazi

Travel Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Ahmad Kamal Parvazi

As you were reading Shayari by Ahmad Kamal Parvazi

Similar Writers

our suggestion based on Ahmad Kamal Parvazi

Similar Moods

As you were reading Travel Shayari Shayari