तन्हाई से बचाव की सूरत नहीं करूँँ

मर जाऊँ क्या किसी से मोहब्बत नहीं करूँ

सू-ए-फ़लक हवाई सफ़र है तो क्या हुआ
डर जाऊँ माहताब की सूरत नहीं करूँ

आँखें हैं या शराब के साग़र भरे हुए
पी जाऊँ क्या ख़याल-ए-शरीअत नहीं करूँ

क़ब्ज़े में उन के शहर-ए-तिलिस्मात ही सही
खो जाऊँ क्या ख़ुदा की इबादत नहीं करूँ

जब तय हुआ कि रौशनी परवरदिगार है
पहलू बचाऊँ उस की इता'अत नहीं करूँ

बज़्म-ए-सुख़न-तराज़ में नाकाम हों तो क्या
चिल्लाऊँ अपने फ़न की हिफ़ाज़त नहीं करूँ

वो आ गया 'कमाल' की क़ीमत के आस-पास
बिक जाऊँ अपने सच की हिफ़ाज़त नहीं करूँ

— Ahmad Kamal Parvazi

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