Aalok Shrivastav

Aalok Shrivastav

@aalok-shrivastav

Aalok Shrivastav shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Aalok Shrivastav's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

हम ने दुनिया की तरफ़ देखा नहीं तुम को चाहा और कुछ सोचा नहीं — Aalok Shrivastav
जिस का तारा था वो आँखें सो गई हैं अब कहाँ करता है मुझ पर नाज़ कोई — Aalok Shrivastav
ज़रा पाने की चाहत में बहुत कुछ छूट जाता है नदी का साथ देता हूँ समुंदर रूठ जाता है — Aalok Shrivastav
पिछले बरस भी हम ने कलाई सजाई थी राखी के धागे आज भी कच्चे नहीं पड़े — Aalok Shrivastav
मैं अपनी दुनिया का ऐसा सूरज हूँ जिस सूरज का गहना मुश्किल होता है — Aalok Shrivastav
यही तो एक तमन्ना है इस मुसाफ़िर की जो तुम नहीं तो सफ़र में तुम्हारा प्यार चले — Aalok Shrivastav
मुझे मालूम है माँ की दुआएँ साथ चलती हैं सफ़र की मुश्किलों को हाथ मलते मैं ने देखा है — Aalok Shrivastav
घर में झीने रिश्ते मैं ने लाखों बार उधड़ते देखे चुपके चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा — Aalok Shrivastav
ग़नीमत है नगर वालों लुटेरों से लुटे हो तुम हमें तो गांव में अक्सर, दरोगा लूट जाता है — Aalok Shrivastav
अब तो ख़ुद अपने ख़ून ने भी साफ़ कह दिया मैं आप का रहूॅंगा मगर उम्र भर नहीं — Aalok Shrivastav
नज़दीकी अक्सर दूरी का कारन भी बन जाती है सोच-समझ कर घुलना-मिलना अपने रिश्ते-दारों में — Aalok Shrivastav
तुम सोच रहे हो बस, बादल की उड़ानों तक मेरी तो निगाहें हैं सूरज के ठिकानों तक — Aalok Shrivastav
आ ही गए हैं ख़्वाब तो फिर जाएँगे कहाँ आँखों से आगे उन की कोई रहगुज़र नहीं — Aalok Shrivastav
ये सोचना ग़लत है कि तुम पर नज़र नहीं मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर बे-ख़बर नहीं — Aalok Shrivastav

Ghazal

धड़कते साँस लेते रुकते चलते मैं ने देखा है कोई तो है जिसे अपने में पलते मैं ने देखा है तुम्हारे ख़ून से मेरी रगों में ख़्वाब रौशन है तुम्हारी आदतों में ख़ुद को ढलते मैं ने देखा है न जाने कौन है जो ख़्वाब में आवाज़ देता है ख़ुद अपने-आप को नींदों में चलते मैं ने देखा है मेरी ख़ामोशियों में तैरती हैं तेरी आवाज़ें तिरे सीने में अपना दिल मचलते मैं ने देखा है बदल जाएगा सब कुछ बादलों से धूप चटख़ेगी बुझी आँखों में कोई ख़्वाब जलते मैं ने देखा है मुझे मालूम है उन की दुआएँ साथ चलती हैं सफ़र की मुश्किलों को हाथ मलते मैं ने देखा है — Aalok Shrivastav
हमेशा ज़िंदगी की हर कमी को जीते रहते हैं जिसे हम जी नहीं पाए उसी को जीते रहते हैं हमारे दुख की बारिश को कोई दामन नहीं मिलता हमारी आँख के बादल नमी को जीते रहते हैं किसी के साथ हैं रस्में किसी के साथ हैं क़स में किसी के साथ जीना है किसी को जीते रहते हैं हमें मा'लूम है इक दिन भरोसा टूट जाएगा मगर फिर भी सराबों में नदी को जीते रहते हैं हमारे साथ चलती है तुम्हारे प्यार की ख़ुशबू लगाई थी जो तुम ने उस लगी को जीते रहते हैं चहकते घर महकते खेत और वो गाँव की गलियाँ जिन्हें हम छोड़ आए उन सभी को जीते रहते है ख़ुदा के नाम-लेवा हम भी हैं तुम भी हो और वो भी मगर अफ़सोस सब अपनी ख़ुदी को जीते रहते हैं — Aalok Shrivastav
जिन बातों को कहना मुश्किल होता है उन बातों को सहना मुश्किल होता है इस दुनिया में रह कर हम ने ये जाना इस दुनिया में रहना मुश्किल होता है जिस धारा में बहना सब से आसाँ हो उस धारा में बहना मुश्किल होता है उस के साथ हमें आसानी है कितनी उस से ये भी कहना मुश्किल होता है उस के ता'ने उस के ता'ने होते हैं मुश्किल से भी सहना मुश्किल होता है वो सब बातें जो तुम अक्सर कहती हो उन बातों का सहना मुश्किल होता है वो बातें जो कहने में आसान लगें उन बातों का कहना मुश्किल होता है माज़ी की यादें भी ऐसा सूरज हैं जिस सूरज का गहना मुश्किल होता है मैं अपनी दुनिया का ऐसा सूरज हूँ जिस सूरज का गहना मुश्किल होता है लगती है ये बहर बहुत आसान मगर इस में ग़ज़लें कहना मुश्किल होता है — Aalok Shrivastav
जिन बातों को कहना मुश्किल होता है उन बातों को सहना मुश्किल होता है इस दुनिया में रह कर हम ने ये जाना इस दुनिया में रहना मुश्किल होता है जिस धारा में बहना सब से आसाँ हो उस धारा में बहना मुश्किल होता है उस के साथ हमें आसानी है कितनी उस से ये भी कहना मुश्किल होता है उस के ता'ने उस के ता'ने होते हैं मुश्किल से भी सहना मुश्किल होता है वो सब बातें जो तुम अक्सर कहती हो उन बातों का सहना मुश्किल होता है वो बातें जो कहने में आसान लगें उन बातों का कहना मुश्किल होता है माज़ी की यादें भी ऐसा सूरज हैं जिस सूरज का गहना मुश्किल होता है मैं अपनी दुनिया का ऐसा सूरज हूँ जिस सूरज का गहना मुश्किल होता है लगती है ये बहर बहुत आसान मगर इस में ग़ज़लें कहना मुश्किल होता है — Aalok Shrivastav
ये और बात दूर रहे मंज़िलों से हम बच कर चले हमेशा मगर क़ाफ़िलों से हम होने को फिर शिकार नई उलझनों से हम मिलते हैं रोज़ अपने कई दोस्तों से हम बरसों फ़रेब खाते रहे दूसरों से हम अपनी समझ में आए बड़ी मुश्किलों से हम मंज़िल की है तलब तो हमें साथ ले चलो वाक़िफ़ हैं ख़ूब राह की बारीकियों से हम जिन के परों पे सुब्ह की ख़ुशबू के रंग हैं बचपन उधार लाए हैं उन तितलियों से हम कुछ तो हमारे बीच कभी दूरियाँ भी हों तंग आ गए हैं रोज़ की नज़दीकियों से हम गुज़रें हमारे घर की किसी रहगुज़र से वो पर्दे हटाएँ देखें उन्हें खिड़कियों से हम जब भी कहा कि याद हमारी कहाँ उन्हें पकड़े गए हैं ठीक तभी हिचकियों से हम — Aalok Shrivastav
ठीक हुआ जो बिक गए सैनिक मुट्ठी भर दीनारों में वैसे भी तो ज़ंग लगा था पुश्तैनी हथियारों में सर्द नसों में चलते चलते गर्म लहू जब बर्फ़ हुआ चार पड़ोसी जिस्म उठा कर झोंक आए अंगारों में खेतों को मुट्ठी में भरना अब तक सीख नहीं पाया यूँँ तो मेरा जीवन बीता सामंती अय्यारों में कैसे उस के चाल-चलन में अंग्रेज़ी अंदाज़ न हो आख़िर उस ने साँसें लीं हैं पच्छिम के दरबारों में नज़दीकी अक्सर दूरी का कारन भी बन जाती है सोच-समझ कर घुलना-मिलना अपने रिश्ते-दारों में चाँद अगर पूरा चमके तो उस के दाग़ खटकते हैं एक न एक बुराई तय है सारे इज़्ज़त-दारों में — Aalok Shrivastav