तू वफ़ा कर के भूल जा मुझ को अब ज़रा यूँ भी आज़मा मुझ कोये ज़माना बुरा नहीं है मगरअपनी नज़रों से देखना मुझ कोबे-सदा काग़ज़ों में आग लगाआज की रात गुनगुना मुझ कोतुझ को किस किस में ढूँढ़ता आख़िरतू भी किस किस से माँगता मुझ कोअब किसी और का पुजारी हैजिस ने माना था देवता मुझ को— Aalok Shrivastav