तुझ से बिछड़ूँ तो तिरी ज़ात का हिस्सा हो जाऊँ
    जिस से मरता हूँ उसी ज़हरस अच्छा हो जाऊँ

    तुम मिरे साथ हो ये सच तो नहीं है लेकिन
    मैं अगर झूट न बोलूँ तो अकेला हो जाऊँ

    मैं तिरी क़ैद को तस्लीम तो करता हूँ मगर
    ये मिरे बस में नहीं है कि परिंदा हो जाऊँ

    आदमी बन के भटकने में मज़ा आता है
    मैं ने सोचा ही नहीं था कि फ़रिश्ता हो जाऊँ

    वो तो अंदर की उदासी ने बचाया वर्ना
    उन की मर्ज़ी तो यही थी कि शगुफ़्ता हो जाऊँ
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    Ahmad Kamal Parvazi
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    कँवारे आँसुओं से रात घाएल होती रहती है
    सितारे झड़ते रहते हैं रेहरसल होती रहती है

    सियासी मश्क़ कर के तुम तो दिल्ली लौट जाते हो
    यहाँ सह
    में हुए लोगों में हलचल होती रहती है

    वहाँ रक्खे हुए मोहरे बराबर मरते रहते हैं
    इधर खेली हुई बाज़ी मुकम्मल होती रहती है

    मैं सब कुछ भूल के जाने की कोशिश करता रहता हूँ
    मगर गुज़री हुई वो रात पागल होती रहती है

    न जाने क्या ख़राबी आ गई है मेरे लहजे में
    न जाने क्यूँ मिरी आवाज़ बोझल होती रहती है
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    Ahmad Kamal Parvazi
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    अमल बर-वक़्त होना चाहिए था
    ज़मीं नम थी तो बोना चाहिए था

    समझना था मुझे बारिश का पानी
    तुम्हें कपड़े भिगोना चाहिए था

    तू जादू है तो कोई शक नहीं है
    मैं पागल हूँ तो होना चाहिए था

    मैं मुजरिम हूँ तो मुजरिम इस लिए हूँ
    मुझे सालिम खिलौना चाहिए था

    अगर कट-फट गया था मेरा दामन
    तुम्हें सीना पिरोना चाहिए था
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    Ahmad Kamal Parvazi
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    शाम के ब'अद सितारों को सँभलने न दिया
    रात को रोक लिया चाँद को ढलने न दिया

    मौज-ए-बातिन कभी औक़ात से बाहर न गई
    हद के अंदर भी किसी शय को मचलने न दिया

    आग तो चारों ही जानिब थी पर अच्छा ये है
    होश-मंदी से किसी चीज़ को जलने न दिया

    अब के मुख़्तार ने मुहताज की दीवार का क़द
    जितना मामूल है उतना भी निकलने न दिया

    जिन बुज़ुर्गों की विरासत के अमीं हैं हम लोग
    उन की क़ब्रों ने कभी शहर बदलने न दिया
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    Ahmad Kamal Parvazi
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    मैं रंग-ए-आसमाँ कर के सुनहरी छोड़ देता हूँ
    वतन की ख़ाक ले कर एक मुट्ठी छोड़ देता हूँ

    ये क्या कम है कि हक़्क़-ए-ख़ुद-परस्ती छोड़ देता हूँ
    तुम्हारा नाम आता है तो कुर्सी छोड़ देता हूँ

    मैं रोज़-ए-जश्न की तफ़्सील लिख कर रख तो लेता हूँ
    मगर उस जश्न की तारीख़ ख़ाली छोड़ देता हूँ

    बहुत मुश्किल है मुझ से मय-परस्ती कैसे छूटेगी
    मगर हाँ आज से फ़िर्का-परस्ती छोड़ देता हूँ

    ख़ुद अपने हाथ से रस्म-ए-विदाई कर तो दी पर अब
    कोई बारात आती है तो बस्ती छोड़ देता हूँ

    तुम्हारे वस्ल का जिस दिन कोई इम्कान होता है
    मैं उस दिन रोज़ा रखता हूँ बुराई छोड़ देता हूँ

    हुकूमत मिल गई तो उन का कूचा छूट जाएगा
    इसी नुक़्ते पे आ कर बादशाही छोड़ देता हूँ

    मुबारक हो तुझे सद-आफ़रींशान-ए-महरूमी
    तिरे पहलू में आ के घर-गृहस्ती छोड़ देता हूँ
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    Ahmad Kamal Parvazi
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    तुम पे सूरज की किरन आए तो शक करता हूँ
    चाँद दहलीज़ पे रुक जाए तो शक करता हूँ

    मैं क़सीदा तिरा लिक्खूँ तो कोई बात नहीं
    पर कोई दूसरा दोहराए तो शक करता हूँ

    उड़ते उड़ते कभी मासूम कबूतर कोई
    आप की छत पे उतर जाए तो शक करता हूँ

    फूल के झुण्ड से हट कर कोई प्यासा भँवरा
    तेरे पहलू से गुज़र जाए तो शक करता हूँ

    ''शिव'' तो एक तराशी हुई मूरत है मगर
    तू उन्हें देख के शरमाए तो शक करता हूँ
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    Ahmad Kamal Parvazi
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    फूल पर ओस का क़तरा भी ग़लत लगता है
    जाने क्यूँ आप को अच्छा भी ग़लत लगता है

    मुझ को मालूम है महबूब-परस्ती का अज़ाब
    देर से चाँद निकलना भी ग़लत लगता है

    आप की हर्फ़-अदाई का ये आलम है कि अब
    पेड़ पर शहद का छत्ता भी ग़लत लगता है

    एक ही तीर है तरकश में तो उजलत न करो
    ऐसे मौक़े' पे निशाना भी ग़लत लगता है

    शाख़-ए-गुल काट के त्रिशूल बना देते हो
    क्या गुलाबों का महकना भी ग़लत लगता है
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    Ahmad Kamal Parvazi
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    वो अब तिजारती पहलू निकाल लेता है
    मैं कुछ कहूँ तो तराज़ू निकाल लेता है

    वो फूल तोड़े हमें कोई ए'तिराज़ नहीं
    मगर वो तोड़ के ख़ुशबू निकाल लेता है

    मैं इस लिए भी तिरे फ़न की क़द्र करता हूँ
    तू झूट बोल के आँसू निकाल लेता है

    अँधेरे चीर के जुगनू निकालने का हुनर
    बहुत कठिन है मगर तू निकाल लेता है

    वो बे-वफ़ाई का इज़हार यूँ भी करता है
    परिंदे मार के बाज़ू निकाल लेता है
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    Ahmad Kamal Parvazi
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    मैं इस लिए भी तेरे फ़न की क़द्र करता हूँ
    तू झूठ बोल के आँसू निकाल लेता है
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