आख़िरी मा'रका अब शहर-ए-धुआँ-धार में है

मेरे सिरहाने का पत्थर इसी दीवार में है

अब हमें पिछले हवाला नहीं देना पड़ते
इक यही फ़ाएदा बिगड़े हुए किरदार में है

बेशतर लोग जिसे उम्र-ए-रवाँ कहते हैं
वो तो इक शाम है और कूचा-ए-दिलदार में है

ये भी मुमकिन है कि लहजा ही सलामत न रहे
मज्लिस-ए-शहर भी अब शहर के बाज़ार में है

दिल कहाँ अपनी रियासत से अलग जाता है
वो तो अब भी उसी उजड़े हुए दरबार में है

— Ahmad Kamal Parvazi

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