Abbas Tabish

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@abbas-tabish

Abbas Tabish shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Abbas Tabish's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher(37)
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Sher

मुझ को उस की आँखों में कूदने की आदत है मैं तुम्हें बताऊँगा ख़ुद-कुशी के बारे में — Abbas Tabish
क्या तमाशा है कि सब मुझ को बुरा कहते हैं और सब चाहते हैं मेरी तरह का होना — Abbas Tabish
बस एक मोड़ मिरी ज़िंदगी में आया था फिर इस के बा'द उलझती गई कहानी मेरी — Abbas Tabish
ये जो है फूल हथेली पे इसे फूल न जान मेरा दिल जिस्म से बाहर भी तो हो सकता है — Abbas Tabish
सुनहरी लड़कियों इनको मिलो मिलो न मिलो ग़रीब होते हैं बस ख़्वाब देखने के लिए — Abbas Tabish
चलता रहने दो मियाँ सिलसिला दिलदारी का आशिक़ी दीन नहीं है कि मुकम्मल हो जाए — Abbas Tabish
आदतन उस के लिए फूल ख़रीदे वरना नहीं मालूम वो इस बार यहाँ है कि नहीं — Abbas Tabish
मैं ने पूछा था कि इज़हार नहीं हो सकता दिल पुकारा कि ख़बर-दार नहीं हो सकता — Abbas Tabish
शायद किसी बला का था साया दरख़्त पर चिड़ियों ने रात शोर मचाया दरख़्त पर — Abbas Tabish
मैं तो ऐ इश्क़ तेरी कूज़ा-गरी जानता हूँ तू ने हम दो को मिलाया तो बना एक ही शख़्स — Abbas Tabish
एक मुद्दत से मिरी माँ नहीं सोई 'ताबिश' मैं ने इक बार कहा था मुझे डर लगता है — Abbas Tabish
मैं अपने बा'द बहुत याद आया करता हूँ तुम अपने पास न रखना कोई निशानी मेरी — Abbas Tabish
मैं तेरे बा'द कोई तेरे जैसा ढूँढ़ता हूँ जो बे-वफ़ाई करे और बे-वफ़ा न लगे — Abbas Tabish
मुद्दत के बा'द ख़्वाब में आया था मेरा बाप और उस ने मुझ सेे इतना कहा ख़ुश रहा करो — Abbas Tabish
हम हैं सूखे हुए तालाब पे बैठे हुए हंस जो तअ'ल्लुक़ को निभाते हुए मर जाते हैं — Abbas Tabish
ये मोहब्बत की कहानी नहीं मरती लेकिन लोग किरदार निभाते हुए मर जाते हैं — Abbas Tabish
पाँव पड़ता हुआ रस्ता नहीं देखा जाता जाने वाले तिरा जाना नहीं देखा जाता — Abbas Tabish

Ghazal

दश्त में प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं हम परिंदे कहीं जाते हुए मर जाते हैं हम हैं सूखे हुए तालाब पे बैठे हुए हंस जो तअल्लुक़ को निभाते हुए मर जाते हैं घर पहुँचता है कोई और हमारे जैसा हम तेरे शहर से जाते हुए मर जाते हैं किस तरह लोग चले जाते हैं उठ कर चुप -चाप हम तो ये ध्यान में लेट हुए मर जाते हैं उन के भी क़त्ल का इल्ज़ाम हमारे सर है जो हमें ज़हर पिलाते हुए मर जाते हैं ये मोहब्बत की कहानी नहीं मरती लेकिन लोग किरदार निभाते हुए मर जाते हैं हम हैं वो टूटी हुई कश्तियों वाले 'ताबिश ' जो किनारों को मिलाते हुए मर जाते हैं — Abbas Tabish
कोई टकरा के सुबुक-सर भी तो हो सकता है मेरी ता'मीर में पत्थर भी तो हो सकता है क्यूँँ न ऐ शख़्स तुझे हाथ लगा कर देखूँ तू मिरे वहम से बढ़ कर भी तो हो सकता है तू ही तू है तो फिर अब जुमला जमाल-ए-दुनिया तेरा शक और किसी पर भी तो हो सकता है ये जो है फूल हथेली पे इसे फूल न जान मेरा दिल जिस्म से बाहर भी तो हो सकता है शाख़ पर बैठे परिंदे को उड़ाने वाले पेड़ के हाथ में पत्थर भी तो हो सकता है क्या ज़रूरी है कि बाहर ही नुमू हो मेरी मेरा खिलना मिरे अंदर भी तो हो सकता है ये जो है रेत का टीला मिरे क़दमों के तले कोई दम में मिरे ऊपर भी तो हो सकता है क्या ज़रूरी है कि हम हार के जीतें 'ताबिश' इश्क़ का खेल बराबर भी तो हो सकता है — Abbas Tabish

Nazm

वो कैसी है उसे मैं ने नहीं देखा सुना है वो ज़मीं-ज़दी धानक से अपने ख़्वाबों के उफ़ुक़ गुल-रंग रखती है मेरे ख़ुश्क से आगे किसी मंज़र में रहती है हवा के घर में रहती है वो किस सूरज का हिस्सा है वो किस तरह की मिट्टी है उसे मैं ने नहीं देखा मेरी आँखों से ले कर उस की आँखों तक किसे मालूम है कितने सितारे हैं मुझे क्या इल्म वो किस रंग के कपडे पहनती है वो ख़ाली बर्तनों में अपना दिन कैसे बिताती है वो ख़ुशियाँ ढूँढ़ती है और ख़ुद को बंद अलमारी में रख कर बहुत जाती है वो घर के लॉन में बैठी बहुत कुछ सोचती होगी की मेरा रंग कैसा है मेरी आँखों के रौशन कुमकुमों में तब कितनी है मेरी शिरयण में सह में हुए बच्चों पे क्या गुज़री वो किस रस्ते पे चल निकले की अपने घर नहीं पहुंचे वो अक्सर सोचती होगी मेरे कमरे में बूढी फ़ाहिशा तन्हाई के होते मेरे दिन कैसे कटते हैं मेरी बे-ख़्वाब रातें किन ख़यालों में गुज़रती हैं कहन इश्क़-ए-गुरेज़ाँ की कहानी ख़त्म होती है वो घर के लॉन में बैठी यही कुछ सोचती होगी की मेरे नाम के पीछे मेरी तस्वीर कैसी है मेरे ख़त भी नहीं उस के तसर्रुफ़ में कि उन को खोल कर मेरे बदन के राज़ तक पहुंचे मुझे उस ने नहीं देखना मैं ने उस को देखा है ना उस ने मुझ को देखा है मगर अपनी मोहब्बत में अजब हुस्न-ए-तवाज़ुन है वो अक्सर सोचती होगी में कितना अपने दफ्तर में हूँ कितना घर की ख़ल्वत में वो मुझ को मुझ पे ही तक़्सीम कर के देखती होगी मुझे महसूस होता है कोई दिल चीरती ख़ुशबू मुझे आवाज़ देती है मगर आवाज़ के पीछे कोई चेहरा नहीं होता वो मुझ को देख लेती है मगर मेरी बसारत में महक चेहरा नहीं पाती की ख़ुशबू किस ने देखी है सदा को किस ने पकड़ा हैं मकानी दूरियाँ कैसी? ज़मानी क़ुर्बतें कैसी? वो मेरा जिस्म है लेकिन उसे मैं ने नहीं देखा — Abbas Tabish
किसी के बा'द अपने हाथों की बद-सूरती में खो गई है वो मुझे कहती है 'ताबिश'! तुम ने देखा मेरे हाथों को बुरे हैं ना? अगर ये ख़ूब-सूरत थे तो इन में कोई बोसा क्यूँ नहीं ठहरा अजब लड़की है मिलाएगा जिस्म से काट कर फ़क़त हाथों में ज़िंदा है सुराही-दर गर्दन नरम होंठों तेज़ नज़रों से वो बाद-जान है की इन अपनों ने ही उस को सर-ए-बाज़ार फेंका था कभी आँखों में डूबी और कभी बिस्तर पे सिलवट की तरह उभरी अजब लड़की है ख़ुद को ढूँढ़ती है अपने हाथों की लकीरों में जहाँ वो थी न है आइंदा भी शायद नहीं होगी वो जब उँगली घुमा कर 'फ़ैज़' की नज़्में सुनती है तो इस के हाथ से मिलाएगा बदन का दुख झलकता है वो हंसती है तो उस के हाथ रोते हैं अजब लड़की है मिलाएगा जिस्म से काट कर फ़क़त हाथों में ज़िंदा है मुझे कहती है 'ताबिश'! तुम ने देखा मेरे हाथों को बुरे हैं ना? मैं शायद गिर चूका हूँ अपनी नज़रों से मैं छुपना चाहता हूँ उस के थैले में जहाँ सिगरेट हैं माचिस है जो उस का हाल माज़ी और मुस्तक़बिल! अजब लड़की है आए तो ख़ुशी की तरह आती है उसे मुझ से मोहब्बत है की शायद मुझ में भी बद-सूरती है उस के हाथों की! — Abbas Tabish