देख दीवारों पे ग़हरी झुर्रियाँ बारिश के बा'द
और बूढ़ा हो गया कच्चा मकाँ बारिश के बा'द
अब मैं तन्हा भीगता उन को नज़र आता नहीं
सब निकल आएँगे ले कर छतरियाँ बारिश के बा'द
तू है सतरंगी धनक और मैं गली कूचों की गर्द
तू कहाँ बारिश से पहले मैं कहाँ बारिश के बा'द
— Abbas Tabish















