Zafar Gorakhpuri

Zafar Gorakhpuri

@zafar-gorakhpuri

Zafar Gorakhpuri shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Zafar Gorakhpuri's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

देर तक हँसता रहा उन पर हमारा बचपना तजरबे आए थे संजीदा बनाने के लिए — Zafar Gorakhpuri
अपने अतवार में कितना बड़ा शातिर होगा ज़िंदगी तुझ से कभी जिस ने शिकायत नहीं की — Zafar Gorakhpuri
होती न अगर जिस्म की तहज़ीब कोई शय जीने के लिए एक तेरी याद बहुत थी — Zafar Gorakhpuri
आग तेरी है न मेरी आग को मत दे हवा राख मेरा घर हुआ तो तेरा घर देखेगा कौन — Zafar Gorakhpuri
किसी मासूम बच्चे के तबस्सुम में उतर जाओ तो शायद ये समझ पाओ ख़ुदा ऐसा भी होता है — Zafar Gorakhpuri
देखें क़रीब से भी तो अच्छा दिखाई दे इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे — Zafar Gorakhpuri
फ़ुर्सत मिले तो पूछ कभी उन का हाल भी जो लोग जी रहे हैं तेरे प्यार के बग़ैर — Zafar Gorakhpuri
पत्थर कहा गया कभी शीशा कहा गया दिल जैसी एक चीज़ को क्या क्या कहा गया — Zafar Gorakhpuri
एक मुट्ठी प्यार उस के पास काँसे बे-शुमार वो अगर बाँटे भी तो हिस्से में क्या आ जाएगा — Zafar Gorakhpuri
उस पे पत्थर खा के क्या बीती 'ज़फ़र' देखेगा कौन फल तो सब ले जाएँगे ज़ख़्म-ए-शजर देखेगा कौन — Zafar Gorakhpuri
छत टपकती थी अगरचे फिर भी आ जाती थी नींद मैं नए घर में बहुत रोया पुराने के लिए — Zafar Gorakhpuri

Ghazal

मेरी इक छोटी सी कोशिश तुझ को पाने के लिए बन गई है मसअला सारे ज़माने के लिए रेत मेरी उम्र मैं बच्चा निराले मेरे खेल मैं ने दीवारें उठाई हैं गिराने के लिए वक़्त होंटों से मेरे वो भी खुरच कर ले गया इक तबस्सुम जो था दुनिया को दिखाने के लिए आसमाँ ऐसा भी क्या ख़तरा था दिल की आग से इतनी बारिश एक शो'ले को बुझाने के लिए छत टपकती थी अगरचे फिर भी आ जाती थी नींद मैं नए घर में बहुत रोया पुराने के लिए देर तक हँसता रहा उन पर हमारा बचपना तजरबे आए थे संजीदा बनाने के लिए मैं 'ज़फ़र' ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में अपनी घर-वाली को इक कंगन दिलाने के लिए — Zafar Gorakhpuri
ज़मीं फिर दर्द का ये साएबाँ कोई नहीं देगा तुझे ऐसा कुशादा आसमाँ कोई नहीं देगा अभी ज़िंदा हैं हम पर ख़त्म कर ले इम्तिहाँ सारे हमारे बा'द कोई इम्तिहाँ कोई नहीं देगा जो प्यासे हो तो अपने साथ रक्खो अपने बादल भी ये दुनिया है विरासत में कुआँ कोई नहीं देगा मिलेंगे मुफ़्त शोलों की क़बाएँ बाँटने वाले मगर रहने को काग़ज़ का मकाँ कोई नहीं देगा ख़ुद अपना अक्स बिक जाए असीर-ए-आईना हो कर यहाँ इस दाम पर नाम-ओ-निशाँ कोई नहीं देगा हमारी ज़िंदगी बेवा दुल्हन भीगी हुई लकड़ी जलेंगे चुपके चुपके सब धुआँ कोई नहीं देगा — Zafar Gorakhpuri

Nazm

"इक्कीसवीं सदी" दुख सुख था एक सबका अपना हो या बेग़ाना इक वो भी था ज़माना इक ये भी है ज़माना दादा हयात थे जब मिट्टी का एक घर था चोरों का कोई खटका ना डाकुओं का डर था खाते थे रूखी-सूखी सोते थे नींद गहरी शा में भरी भरी थी आबाद थी दोपहरी संतोष था दिलों को माथे पे बल नहीं था दिल में कपट नहीं था आँखों में छल नहीं था थे लोग भोले-भाले लेकिन थे प्यार वाले दुनिया से कितनी जल्दी सब हो गए रवाना अब्बा का वक़्त आया ता'लीम घर में आई ता'लीम साथ अपने ताज़ा विचार लाई आगे रिवायतों से बढ़ने का ध्यान आया मिट्टी का घर हटा तो पक्का मकान आया दफ़्तर की नौकरी थी तनख़्वाह का सहारा मालिक पे था भरोसा हो जाता था गुज़ारा पैसा अगरचे कम था फिर भी न कोई ग़म था कैसा भरा-पुरा था अपना ग़रीब-ख़ाना अब मेरा दौर है ये कोई नहीं किसी का हर आदमी अकेला हर चेहरा अजनबी सा आँसू न मुस्कुराहट जीवन का हाल ऐसा अपनी ख़बर नहीं है माया का जाल ऐसा पैसा है मर्तबा है इज़्ज़त वक़ार भी है नौकर हैं और चाकर बंगला है कार भी है ज़र पास है ज़मीं है लेकिन सुकूँ नहीं है पाने के वास्ते कुछ क्या क्या पड़ा गँवाना ऐ आने वाली नस्लों ऐ आने वाले लोगों भोगा है हम ने जो कुछ वो तुम कभी न भोगो जो दुख था साथ अपने तुम से क़रीब न हो पीड़ा जो हम ने झेली तुम को नसीब न हो जिस तरह भीड़ में हम ज़िंदा रहे अकेले वो ज़िन्दगी की महफ़िल तुम से न कोई ले ले तुम जिस तरफ़ से गुज़रो मेला हो रौशनी का रास आए तुम को मौसम इक्कीसवीं सदी का हम तो सुकूँ को तरसे तुम पर सुकून बरसे आनंद हो दिलों में जीवन लगे सुहाना — Zafar Gorakhpuri
"चाचा नेहरू का ख़त बच्चों के नाम" मिरे अज़ीज़ वतन के अज़ीज़ फ़रज़ंदो मिरे वतन की नई सुब्ह के नक़ीब हो तुम बिछड़ के तुम से कई साल हो चुके हैं मगर गुमान होता है अब तक मिरे क़रीब हो तुम दिवालियाँ हों कि ईदें ख़ुशी मना लेना कभी ये दिल में न लाना कि बद-गुमाँ हूँ मैं तुम इस यक़ीन को दिल से निकालना न कभी कि दूर रह के भी तुम सब के दरमियाँ हूँ मैं मैं जानता हूँ जुदाई का दुख बहुत होगा तुम अपने दुख को अमल से मिटा भी सकते हो अगरचे दूर हूँ तुम से बहुत ही दूर मगर मुझे तलाश करो तुम तो पा भी सकते तुम्हें मिलूँगा मैं गंगा की शोख़ मौजों में वो शोख़ मौजें जिन्हों ने मुझे क़रार दिया तुम्हें मिलूँगा हिमाला की सब्ज़-वादी में तमाम उम्र मुझे जिस ने माँ का प्यार दिया तुम्हें मिलूँगा मैं खेतों की गर्म मिट्टी में किसान अपना पसीना जहाँ बहाते हैं तुम्हें मिलूँगा मशीनों के दरमियान जहाँ हज़ारों हाथ नई क़िस्मतें बनाते हैं तुम्हें मिलूँगा मैं काशी की सरहदों में कभी कभी मिलूँगा मैं अजमेर के गुलिस्ताँ में कभी चराग़ की मानिंद शब के सीने पर कभी गुलाब की सूरत वतन के दामाँ में — Zafar Gorakhpuri
अब के साल पूनम में, जब तू आएगी मिलने हम ने सोच रखा है रात यूँँ गुज़ारेंगे धड़कनें बिछा देंगे शोख़ तेरे क़दमों पे हम निगाहों से तेरी आरती उतारेंगे तू कि आज क़ातिल है, फिर भी राहत-ए-दिल है ज़हर की नदी है तू, फिर भी क़ीमती है तू पस्त हौसले वाले तेरा साथ क्या देंगे ज़िन्दगी इधर आ जा, हम तुझे गुज़ारेंगे आहनी कलेजे को, ज़ख़्म की ज़रूरत है उँगलियों से जो टपके, उस लहू की हाज़त है आप ज़ुल्फ़-ए-जानां के, ख़म सँवारिए साहब ज़िन्दगी की ज़ुल्फ़ों को आप क्या सँवारेंगे हम तो वक़्त हैं पल हैं, तेज़ गाम घड़ियाँ हैं बे-क़रार लमहे हैं, बेथकान सदियाँ हैं कोई साथ में अपने, आए या नहीं आए जो मिलेगा रस्ते में हम उसे पुकारेंगे — Zafar Gorakhpuri