माहौल बे-मज़ा है तेरे प्यार के बग़ैर
कैसे पिए शराब कोई यार के बग़ैर
कैसे पिए शराब कोई यार के बग़ैर
ये इश्क़ भी है कितना अनोखा मु'आमला
इक़रार के बग़ैर न इनकार के बग़ैर
फूलों से गर बहार ने भर भी दिया तो क्या
दामन मेरा उदास रहा ख़ार के बग़ैर
फ़ुर्सत मिले तो पूछ कभी उन का हाल भी
जो लोग जी रहे हैं तेरे प्यार के बग़ैर
उस शोख़ से बिछड़ के 'ज़फ़र अपनी ज़िंदगी
जैसे मकान हो कोई दीवार के बग़ैर
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अभी ज़िंदा हैं हम पर ख़त्म कर ले इम्तिहाँ सारे
हमारे बा'द कोई इम्तिहाँ कोई नहीं देगा
जो प्यासे हो तो अपने साथ रक्खो अपने बादल भी
ये दुनिया है विरासत में कुआँ कोई नहीं देगा
मिलेंगे मुफ़्त शोलों की क़बाएँ बाँटने वाले
मगर रहने को काग़ज़ का मकाँ कोई नहीं देगा
ख़ुद अपना अक्स बिक जाए असीर-ए-आईना हो कर
यहाँ इस दाम पर नाम-ओ-निशाँ कोई नहीं देगा
हमारी ज़िंदगी बेवा दुल्हन भीगी हुई लकड़ी
जलेंगे चुपके चुपके सब धुआँ कोई नहीं देगा
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किसी मासूम बच्चे के तबस्सुम में उतर जाओ
तो शायद ये समझ पाओ ख़ुदा ऐसा भी होता है
तो शायद ये समझ पाओ ख़ुदा ऐसा भी होता है
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अब के साल पूनम में, जब तू आएगी मिलने
हम ने सोच रखा है रात यूँ गुज़ारेंगे
हम ने सोच रखा है रात यूँ गुज़ारेंगे
धड़कनें बिछा देंगे शोख़ तेरे क़दमों पे
हम निगाहों से तेरी आरती उतारेंगे
तू कि आज क़ातिल है, फिर भी राहत-ए-दिल है
ज़हर की नदी है तू, फिर भी क़ीमती है तू
पस्त हौसले वाले तेरा साथ क्या देंगे
ज़िन्दगी इधर आ जा, हम तुझे गुज़ारेंगे
आहनी कलेजे को, ज़ख़्म की ज़रूरत है
उँगलियों से जो टपके, उस लहू की हाज़त है
आप ज़ुल्फ़-ए-जानां के, ख़म सँवारिए साहब
ज़िन्दगी की ज़ुल्फ़ों को आप क्या सँवारेंगे
हम तो वक़्त हैं पल हैं, तेज़ गाम घड़ियाँ हैं
बे-क़रार लमहे हैं, बेथकान सदियाँ हैं
कोई साथ में अपने, आए या नहीं आए
जो मिलेगा रस्ते में हम उसे पुकारेंगे
Read Fullहम निगाहों से तेरी आरती उतारेंगे
तू कि आज क़ातिल है, फिर भी राहत-ए-दिल है
ज़हर की नदी है तू, फिर भी क़ीमती है तू
पस्त हौसले वाले तेरा साथ क्या देंगे
ज़िन्दगी इधर आ जा, हम तुझे गुज़ारेंगे
आहनी कलेजे को, ज़ख़्म की ज़रूरत है
उँगलियों से जो टपके, उस लहू की हाज़त है
आप ज़ुल्फ़-ए-जानां के, ख़म सँवारिए साहब
ज़िन्दगी की ज़ुल्फ़ों को आप क्या सँवारेंगे
हम तो वक़्त हैं पल हैं, तेज़ गाम घड़ियाँ हैं
बे-क़रार लमहे हैं, बेथकान सदियाँ हैं
कोई साथ में अपने, आए या नहीं आए
जो मिलेगा रस्ते में हम उसे पुकारेंगे
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दिन को भी इतना अँधेरा है मिरे कमरे में
साया आते हुए डरता है मिरे कमरे में
साया आते हुए डरता है मिरे कमरे में
ग़म थका-हारा मुसाफ़िर है चला जाएगा
कुछ दिनों के लिए ठहरा है मिरे कमरे में
सुब्ह तक देखना अफ़्साना बना डालेगा
तुझ को इक शख़्स ने देखा है मिरे कमरे में
दर-ब-दर दिन को भटकता है तसव्वुर मेरा
हाँ मगर रात को रहता है मिरे कमरे में
चोर बैठा है कहाँ सोच रहा हूँ मैं 'ज़फ़र'
क्या कोई और भी कमरा है मिरे कमरे में
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देखें क़रीब से भी तो अच्छा दिखाई दे
इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे
इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे
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