पत्थर कहा गया कभी शीशा कहा गया
    दिल जैसी एक चीज़ को क्या क्या कहा गया
    Zafar Gorakhpuri
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    होती न अगर जिस्म की तहज़ीब कोई शय
    जीने के लिए एक तेरी याद बहुत थी
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    ज़मीं फिर दर्द का ये साएबाँ कोई नहीं देगा
    तुझे ऐसा कुशादा आसमाँ कोई नहीं देगा

    अभी ज़िंदा हैं हम पर ख़त्म कर ले इम्तिहाँ सारे
    हमारे बाद कोई इम्तिहाँ कोई नहीं देगा

    जो प्यासे हो तो अपने साथ रक्खो अपने बादल भी
    ये दुनिया है विरासत में कुआँ कोई नहीं देगा

    मिलेंगे मुफ़्त शोलों की क़बाएँ बाँटने वाले
    मगर रहने को काग़ज़ का मकाँ कोई नहीं देगा

    ख़ुद अपना अक्स बिक जाए असीर-ए-आईना हो कर
    यहाँ इस दाम पर नाम ओ निशाँ कोई नहीं देगा

    हमारी ज़िंदगी बेवा दुल्हन भीगी हुई लकड़ी
    जलेंगे चुपके चुपके सब धुआँ कोई नहीं देगा
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    Zafar Gorakhpuri
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    आग तेरी है न मेरी आग को मत दे हवा
    राख मेरा घर हुआ तो तेरा घर देखेगा कौन
    Zafar Gorakhpuri
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    किसी मासूम बच्चे के तबस्सुम में उतर जाओ
    तो शायद ये समझ पाओ ख़ुदा ऐसा भी होता है
    Zafar Gorakhpuri
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    छत टपकती थी अगरचे फिर भी आ जाती थी नींद
    मैं नए घर में बहुत रोया पुराने के लिए
    Zafar Gorakhpuri
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    "चाँद कोई अफ़्साना नहीं"
    अब तो इल्म की परवाज़ें
    और ही क़िस्से कहती हैं
    बाजी अब तो मत बोलो
    चाँद में परियाँ रहती हैं
    चाँद न अपना मामूँ है
    और न देस वो परियों का
    चाँद में कोई बुढ़िया है
    और न बुढ़िया का चरख़ा
    सदियों सदियों खोज के बा'द
    अब हम ने ये जाना है
    चाँद कोई अफ़्साना नहीं
    एक हक़ीक़ी दुनिया है
    सर्दी गर्मी दोनों तेज़
    ऑक्सीजन का नाम नहीं
    चट्टानें हैं खाइयाँ हैं
    धरती सा आराम नहीं
    हो जाएगा पर इक रोज़
    जी लेना आसान वहाँ
    अपने जीने का सामाँ
    कर लेगा इंसान वहाँ
    इल्म-ओ-हुनर की धाराएँ
    पीछे को कब बहती हैं
    बाजी अब तो मत बोलो
    चाँद में परियाँ रहती हैं
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    अब के साल पूनम में, जब तू आएगी मिलने
    हम ने सोच रखा है रात यूँ गुज़ारेंगे
    धड़कनें बिछा देंगे शोख़ तेरे क़दमों पे
    हम निगाहों से तेरी आरती उतारेंगे

    तू कि आज क़ातिल है, फिर भी राहत-ए-दिल है
    ज़हर की नदी है तू, फिर भी क़ीमती है तू
    पस्त हौसले वाले तेरा साथ क्या देंगे
    ज़िन्दगी इधर आ जा, हम तुझे गुज़ारेंगे

    आहनी कलेजे को, ज़ख़्म की ज़रूरत है
    उँगलियों से जो टपके, उस लहू की हाज़त है
    आप ज़ुल्फ़-ए-जानां के, ख़म सँवारिए साहब
    ज़िन्दगी की ज़ुल्फ़ों को आप क्या सँवारेंगे

    हम तो वक़्त हैं पल हैं, तेज़ गाम घड़ियाँ हैं
    बेकरार लमहे हैं, बेथकान सदियाँ हैं
    कोई साथ में अपने, आए या नहीं आए
    जो मिलेगा रस्ते में हम उसे पुकारेंगे
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    दिन को भी इतना अंँधेरा है मिरे कमरे में
    साया आते हुए डरता है मिरे कमरे में

    ग़म थका-हारा मुसाफ़िर है चला जाएगा
    कुछ दिनों के लिए ठहरा है मिरे कमरे में

    सुब्ह तक देखना अफ़्साना बना डालेगा
    तुझ को इक शख़्स ने देखा है मिरे कमरे में

    दर-ब-दर दिन को भटकता है तसव्वुर मेरा
    हाँ मगर रात को रहता है मिरे कमरे में

    चोर बैठा है कहाँ सोच रहा हूँ मैं 'ज़फ़र'
    क्या कोई और भी कमरा है मिरे कमरे में
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    Zafar Gorakhpuri
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    देखें क़रीब से भी तो अच्छा दिखाई दे
    इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे
    Zafar Gorakhpuri
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