सो हश्र में लिए दिल-ए-हसरत मआब में
    आबाद हो रहा हूँ जहान-ए-ख़राब में

    हम अपनी बे-क़रारी-ए-दिल से हैं बे-क़रार
    आमेज़़िश-ए-सुकूँ है इस इज़्तिराब में

    अब सैर-ए-गुल कहाँ दिल-ए-रंगीं नज़र कहाँ
    इक ख़्वाब था जो देख लिया था शबाब में

    बढ़ बढ़ के छुप रहे हैं पस पर्दा बार बार
    क्या क्या तकल्लुफ़ात हैं तर्क-ए-हिजाब में

    'अहसन' दिल उनको दो मगर इतना तो पूछ लो
    लेते हो तुम ये नक़्द रक़म किस हिसाब में
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    Ahsan Marahravi
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    मुझे ख़बर नहीं ग़म क्या है और ख़ुशी क्या है
    ये ज़िंदगी की है सूरत तो ज़िंदगी क्या है
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    क़ासिद नई अदा से अदा-ए-पयाम हो
    मतलब ये है कि बात न हो और कलाम हो

    बाक़ी है शौक़ राह में क्यूँकर क़याम हो
    हाथ आएँ उन के पाँव तो मंज़िल तमाम हो

    क्या ख़ुश हो दिल कि है वो जफ़ा-जू ज़मीं से दूर
    तुम कैसे आसमान के क़ाएम-मक़ाम हो

    फ़रमाँ-रवा-ए-हुस्न को होता नहीं फ़रोग़
    जब तक न इश्क़ उस का मुदारुलमहाम हो

    'अहसन' वो सुन के शिकवा-ए-तशहीर कह गए
    हम जानते हैं तुम को बड़े नेक-नाम हो
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    Ahsan Marahravi
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    ऐ दिल न सुन अफ़्साना किसी शोख़ हसीं का
    ना-आक़िबत-अँदेश रहेगा न कहीं का

    दुनिया का रहा है दिल-ए-नाकाम न दीं का
    इस इश्क़-ए-बद-अंजाम ने रक्खा न कहीं का

    हैं ताक में इक शोख़ की दुज़-दीदा निगाहें
    अल्लाह निगहबान है अब जान-ए-हज़ीं का

    हालत दिल-ए-बेताब की देखी नहीं जाती
    बेहतर है कि हो जाए ये पैवंद ज़मीं का

    गो क़द्र वहाँ ख़ाक भी होती नहीं मेरी
    हर वक़्त तसव्वुर है मगर दिल में वहीं का

    हर आशिक़-ए-जाँ-बाज़ को डर ऐ सितम-आरा
    तलवार से बढ़ कर है तिरी चीन-ए-जबीं का

    कुछ सख़्ती-ए-दुनिया का मुझे ग़म नहीं 'अहसन'
    खटका है मगर दिल को दम-ए-बाज़-पसीं का
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    क्यूँ चुप हैं वो बे-बात समझ में नहीं आता
    ये रंग-ए-मुलाक़ात समझ में नहीं आता

    क्या दाद-ए-सुख़न हम तुम्हें दें हज़रत-ए-नासेह
    है सौ की ये इक बात समझ में नहीं आता

    शैख़ और भलाई से करे तज़्किरा तेरा
    ऐ पीर-ए-ख़राबात समझ में नहीं आता

    साया भी शब-ए-हिज्र की ज़ुल्मत में छुपा है
    अब किस से करें बात समझ में नहीं आता

    मुश्ताक़-ए-सितम आप हैं मुश्ताक़-ए-अजल हम
    फिर क्यूँ ये रुका हात समझ में नहीं आता

    रोका उन्हें जाने से सर-ए-शाम तो बोले
    क्यूँ करते हो तुम रात समझ में नहीं आता

    दिल एक है और इस के तलबगार हज़ारों
    दें किस को ये सौग़ात समझ में नहीं आता

    क्यूँ-कर कहूँ 'अहसन' कि अदू दोस्त है मेरा
    हो नेक वो बद-ज़ात समझ में नहीं आता
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    जब तक अपने दिल में उन का ग़म रहा
    हसरतों का रात दिन मातम रहा

    हिज्र में दिल का न था साथी कोई
    दर्द उठ उठ कर शरीक-ए-ग़म रहा

    कर के दफ़्न अपने पराए चल दिए
    बेकसी का क़ब्र पर मातम रहा

    सैकड़ों सर तन से कर डाले जुदा
    उन के ख़ंजर का वही दम-ख़म रहा

    आज इक शोर-ए-क़यामत था बपा
    तेरे कुश्तो का अजब आलम रहा

    हसरतें मिल मिल के रोतीं यास से
    यूँ दिल-ए-मरहूम का मातम रहा

    ले गया ता कू-ए-यार 'अहसन' वही
    मुद्दई कब दोस्तों से कम रहा
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    इश्क़ करते हैं तो अहल-ए-इश्क़ यूँ सौदा करें
    होश का सरमाया नज़्र-ए-हुस्न-ए-बे-परवा करें

    हम न हों लेकिन ज़माने में हमारा नाम हो
    ऐसी हस्ती चाहिए तो मर के हम पैदा करें

    है ख़ुद-आराई किसी की शान-ए-ख़ुद्दारी के साथ
    यानी उन को हम न देखें वो हमें देखा करें

    दर्स-ए-इरफ़ाँ के लिए हर ज़र्रा है तूर-ए-कलीम
    देखने वाले मगर पहले नज़र पैदा करें

    शेख़ को जन्नत मुबारक हम को दोज़ख़ है क़ुबूल
    फ़िक्र-ए-उक़्बा वो करें हम ख़िदमत-ए-दुनिया करें

    एक दिल है एक हसरत एक हम हैं एक तुम
    इतने ग़म कम हैं जो कोई और ग़म पैदा करें

    'अहसन'-ए-रंजूर को दुनिया से क्या है वास्ता
    आप ने बीमार डाला आप ही अच्छा करें
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    क्या ज़रूरत बे-ज़रूरत देखना
    तुम न आईने की सूरत देखना

    फिर गईं बीमार-ए-ग़म को देख कर
    अपनी आँखों की मुरव्वत देखना

    हम कहाँ ऐ दिल कहाँ दीदार-ए-यार
    हो गया तेरी बदौलत देखना

    है वो जब दिल में तो कैसी जुस्तुजू
    ढूँडने वालों की ग़फ़लत देखना

    सामने तारीफ़ पीछे गालियाँ
    उन की मुँह देखी मोहब्बत देखना

    जिन को बाक़ी ही न हो उम्मीद कुछ
    ऐसे मायूसों की हसरत देखना

    मिरा ख़त ये कह के ग़ैरों को दिया
    इक ज़रा इस की इबारत देखना

    और कुछ तुम को न आएगा नज़र
    दिल में रह कर दिल की हसरत देखना

    सुब्ह उठ कर देखना 'अहसन' का मुँह
    ऐसे वैसों की न सूरत देखना
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    Ahsan Marahravi
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    चाहिए इश्क़ में इस तरह फ़ना हो जाना
    जिस तरह आँख उठे महव-ए-अदा हो जाना

    किसी माशूक़ का आशिक़ से ख़फ़ा हो जाना
    रूह का जिस्म से गोया है जुदा हो जाना

    मौत ही आप के बीमार की क़िस्मत में न थी
    वर्ना कब ज़हर का मुमकिन था दवा हो जाना

    अपने पहलू में तुझे देख के हैरत है मुझे
    ख़र्क़-ए-आदत है तिरा वादा वफ़ा हो जाना

    वक़अ'त-ए-इश्क़ कहाँ जब ये तलव्वुन हो वहाँ
    कभी राज़ी कभी आशिक़ से ख़फ़ा हो जाना

    जब मुलाक़ात हुई तुम से तो तकरार हुई
    ऐसे मिलने से तो बेहतर है जुदा हो जाना

    छेड़ कुछ हो कि न हो बात हुई हो कि न हो
    बैठे बैठे उन्हें आता है ख़फ़ा हो जाना

    मुझ से फिर जाए जो दुनिया तो बला से फिर जाए
    तू न ऐ आह ज़माने की हवा हो जाना

    'अहसन' अच्छा है रहे माल-ए-अरब पेश-ए-अरब
    दे के दिल तुम न गिरफ़्तार-ए-बला हो जाना
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    Ahsan Marahravi
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    मुझे ख़बर नहीं ग़म क्या है और ख़ुशी क्या है
    ये ज़िंदगी की है सूरत तो ज़िंदगी क्या है

    फ़ुग़ाँ तो इश्क़ की इक मश्क़-ए-इब्तिदाई है
    अभी तो और बढ़ेगी ये लय अभी क्या है

    तमाम उम्र इसी रंज में तमाम हुई
    कभी ये तुम ने न पूछा तिरी ख़ुशी क्या है

    तुम अपने हो तो नहीं ग़म किसी मुख़ालिफ़ का
    ज़माना क्या है फ़लक क्या है मुद्दई क्या है

    सलाह-ए-कार बनाया है मस्लहत से उसे
    वगर्ना नासेह-ए-नादाँ की दोस्ती क्या है

    दिलों को खींच रही है किसी की मस्त निगाह
    ये दिलकशी है तो फिर उज़्र-ए-मय-कशी क्या है

    मज़ाक़ इश्क़ को समझोगे यूँ न तुम नासेह
    लगा के दिल कहीं देखो ये दिल-लगी क्या है

    वो रात दिन नहीं मिलते तो ज़िद न कर 'अहसन'
    कभी कभी की मुलाक़ात भी बुरी क्या है
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    Ahsan Marahravi
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