Ahsan Marahravi

Ahsan Marahravi

@ahsan-marahravi

Ahsan Marahravi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ahsan Marahravi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मौत ही आप के बीमार की क़िस्मत में न थी वर्ना कब ज़हर का मुमकिन था दवा हो जाना — Ahsan Marahravi
तमाम उम्र इसी रंज में तमाम हुई कभी ये तुम ने न पूछा तेरी ख़ुशी क्या है — Ahsan Marahravi
रोक ले ऐ ज़ब्त जो आँसू कि चश्म-ए-तर में है कुछ नहीं बिगड़ा अभी तक घर की दौलत घर में है — Ahsan Marahravi
किसी माशूक़ का आशिक़ से ख़फ़ा हो जाना रूह का जिस्म से गोया है जुदा हो जाना — Ahsan Marahravi
ये सदमा जीते जी दिल से हमारे जा नहीं सकता उन्हें वो भूले बैठे हैं जो उन पर मरने वाले हैं — Ahsan Marahravi
मुझे ख़बर नहीं ग़म क्या है और ख़ुशी क्या है ये ज़िंदगी की है सूरत तो ज़िंदगी क्या है — Ahsan Marahravi

Ghazal

कशिश-ए-हुस्न की ये अंजुमन-आराई है सारी दुनिया तिरे कूचे में सिमट आई है दर्द ने खोए हुए दिल की जगह पाई है इक बला सर से गई एक बला आई है जाँ निसारों को सहारा जो न जीने का मिला कू-ए-क़ातिल में क़ज़ा खींच के ले आई है मैं छुपाता हूँ ग़म-ए-इश्क़ तो बनता नहीं काम और कहता हूँ तो गोया मिरी रुस्वाई है जिगर ओ दिल में तराज़ू न हो क्यूँँ नावक-ए-नाज़ इस को दोनों से बराबर की शनासाई है दिल ये कहता है वहाँ जा के सँभल जाऊँगा मैं ये कहता हूँ कि बद-बख़्त की मौत आई है बन के नासेह वो ये कहते हैं मोहब्बत न करो मुझ को मरने नहीं देते ये मसीहाई है सब जिसे दाग़-ए-दिल ओ ज़ख़्म-ए-जिगर कहते हैं वो मिरे नाख़ुन-ए-ग़म की चमन-आराई है क्या है दुनिया में नुमूद और नुमाइश के सिवा ज़िंदगी हम को तमाशे के लिए लाई है इश्क़ रुस्वा-कुन-ए-आलम वो है 'अहसन' जिस से नेक-नामों की भी बद-नामी ओ रुस्वाई है — Ahsan Marahravi
मुझे ख़बर नहीं ग़म क्या है और ख़ुशी क्या है ये ज़िंदगी की है सूरत तो ज़िंदगी क्या है फ़ुग़ाँ तो इश्क़ की इक मश्क़-ए-इब्तिदाई है अभी तो और बढ़ेगी ये लय अभी क्या है तमाम उम्र इसी रंज में तमाम हुई कभी ये तुम ने न पूछा तिरी ख़ुशी क्या है तुम अपने हो तो नहीं ग़म किसी मुख़ालिफ़ का ज़माना क्या है फ़लक क्या है मुद्दई क्या है सलाह-ए-कार बनाया है मस्लहत से उसे वगर्ना नासेह-ए-नादाँ की दोस्ती क्या है दिलों को खींच रही है किसी की मस्त निगाह ये दिलकशी है तो फिर उज़्र-ए-मय-कशी क्या है मज़ाक़ इश्क़ को समझोगे यूँँ न तुम नासेह लगा के दिल कहीं देखो ये दिल-लगी क्या है वो रात दिन नहीं मिलते तो ज़िद न कर 'अहसन' कभी कभी की मुलाक़ात भी बुरी क्या है — Ahsan Marahravi
मुतमइन अपने यक़ीं पर अगर इंसाँ हो जाए सौ हिजाबों में जो पिन्हाँ है नुमायाँ हो जाए इस तरह क़ुर्ब तिरा और भी आसाँ हो जाए मेरा एक एक नफ़स काश रग-ए-जाँ हो जाए वो कभी सेहन-ए-चमन में जो ख़िरामाँ हो जाए ग़ुंचा बालीदा हो इतना कि गुलिस्ताँ हो जाए इश्क़ का कोई नतीजा तो हो अच्छा कि बुरा ज़ीस्त मुश्किल है तो मरना मिरा आसाँ हो जाए जान ले नाज़ अगर मर्तबा-ए-इज्ज़-ओ-नियाज़ हुस्न सौ जान से ख़ुद इश्क़ का ख़्वाहाँ हो जाए मेरे ही दम से है आबाद जुनूँ-ख़ाना-ए-इश्क़ मैं न हूँ क़ैद तो बर्बादी-ए-ज़िंदाँ हो जाए है तिरे हुस्न का नज़्ज़ारा वो हैरत-अफ़ज़ा देख ले चश्म-ए-तसव्वुर भी तो हैराँ हो जाए दीद हो बात न हो आँख मिले दिल न मिले एक दिन कोई तो पूरा मिरा अरमाँ हो जाए मैं अगर अश्क-ए-निदामत के जवाहिर भर लूँ तोशा-ए-हश्र मिरा गोशा-ए-दामाँ हो जाए ले के दिल तर्क-ए-जफ़ा पर नहीं राज़ी तो मुझे है ये मंज़ूर कि वो जान का ख़्वाहाँ हो जाए अपनी महफ़िल में बिठा लो न सुनो कुछ न कहो कम से कम एक दिन 'अहसन' पे ये एहसाँ हो जाए — Ahsan Marahravi
क्यूँँ चुप हैं वो बे-बात समझ में नहीं आता ये रंग-ए-मुलाक़ात समझ में नहीं आता क्या दाद-ए-सुख़न हम तुम्हें दें हज़रत-ए-नासेह है सौ की ये इक बात समझ में नहीं आता शैख़ और भलाई से करे तज़्किरा तेरा ऐ पीर-ए-ख़राबात समझ में नहीं आता साया भी शब-ए-हिज्र की ज़ुल्मत में छुपा है अब किस से करें बात समझ में नहीं आता मुश्ताक़-ए-सितम आप हैं मुश्ताक़-ए-अजल हम फिर क्यूँँ ये रुका हात समझ में नहीं आता रोका उन्हें जाने से सर-ए-शाम तो बोले क्यूँँ करते हो तुम रात समझ में नहीं आता दिल एक है और इस के तलबगार हज़ारों दें किस को ये सौग़ात समझ में नहीं आता क्यूँँ-कर कहूँ 'अहसन' कि अदू दोस्त है मेरा हो नेक वो बद-ज़ात समझ में नहीं आता — Ahsan Marahravi
इक नज़र में दर्द खो देना दिल-ए-बीमार का ये तो अदना सा करिश्मा है निगाह-ए-यार का ग़ैर मुमकिन है कि हो पामाल कोई हश्र में हो न जब तक कुछ इशारा आप की रफ़्तार का हज़रत-ए-आदम से ता ईं दम हुए सब इश्क़ दोस्त है अज़ल से दौर दौरा हुस्न की सरकार का हम जो मर कर जी उठे इस पर तअज्जुब क्या कि है वो करामत चाल की ये मोजज़ा गुफ़्तार का आप के ग़म्ज़े उठाऊँ ग़ैर के ता'ने सुनूँ बंदा परवर मैं ने छोड़ा इश्क़ भी सरकार का आबलों को सर उठाने की ज़रा मोहलत नहीं है करम सहरा-नवर्दी में ये नोक-ए-ख़ार का इस से बढ़ कर आप 'अहसन' चाहते हैं और क्या दोस्तों की दाद है गोया सिला अश'आर का — Ahsan Marahravi
ऐ दिल न सुन अफ़्साना किसी शोख़ हसीं का ना-आक़िबत-अँदेश रहेगा न कहीं का दुनिया का रहा है दिल-ए-नाकाम न दीं का इस इश्क़-ए-बद-अंजाम ने रक्खा न कहीं का हैं ताक में इक शोख़ की दुज़-दीदा निगाहें अल्लाह निगहबान है अब जान-ए-हज़ीं का हालत दिल-ए-बेताब की देखी नहीं जाती बेहतर है कि हो जाए ये पैवंद ज़मीं का गो क़द्र वहाँ ख़ाक भी होती नहीं मेरी हर वक़्त तसव्वुर है मगर दिल में वहीं का हर आशिक़-ए-जाँ-बाज़ को डर ऐ सितम-आरा तलवार से बढ़ कर है तिरी चीन-ए-जबीं का कुछ सख़्ती-ए-दुनिया का मुझे ग़म नहीं 'अहसन' खटका है मगर दिल को दम-ए-बाज़-पसीं का — Ahsan Marahravi
यहाँ बग़ैर-फ़ुग़ाँ शब बसर नहीं होती वहाँ असर नहीं होता ख़बर नहीं होती ख़लिश जिगर में है दिल को ख़बर नहीं होती चुभी है फाँस इधर से उधर नहीं होती अबस ही कल के लिए इल्तिवा-ए-मश्क़-ए-ख़िराम क़यामत आज ही क्यूँँ फ़ित्ना-गर नहीं होती जो उन से दूर है उस के लिए हैं चश्म-ब-राह हम उन के पास हैं हम पर नज़र नहीं होती अजल को रोकिए क्या कह के उन के आने तक कि अब तो बात भी ऐ चारा-गर नहीं होती वो आ गए हैं तो आँसू ज़रूर पोंछेंगे अब आँख क्यूँँ मिरी अश्कों से तर नहीं होती कमाल-ए-बे-हुनरी से ग़नी हूँ मैं 'अहसन' मुझे ज़रूरत-ए-अर्ज़-ए-हुनर नहीं होती — Ahsan Marahravi
साक़ी-ओ-वाइ'ज़ में ज़िद है बादा-कश चक्कर में है तू ब-लब पुर और लब डूबा हुआ साग़र में है रोक ले ऐ ज़ब्त जो आँसू कि चश्म-ए-तर में है कुछ नहीं बिगड़ा है अब तक घर की दौलत घर में है दब गया था मेरे मरने से जो ऐ महशर-ख़िराम क्या वही ख़्वाबीदा-फ़ित्ना सूरत-ए-महशर में है जिस को तू चाहे जिला दे जिस को चाहे मार दे वो भी तेरी बात में ये भी तिरी ठोकर में है दिल के मिट जाने से जोश-ए-इश्क़ घट सकता है क्या दिल से क्या मतलब कि ये सौदा तो मेरे सर में है मानता है आस्ताँ को तेरे का'बा और कौन ये हमारा ही निशान-ए-सज्दा संग-ए-दर में है 'अहसन'-ए-आवारा-क़िस्मत की न पूछो गर्दिशें अपने घर बैठा हुआ तक़दीर के चक्कर में है — Ahsan Marahravi
बाहम जो हुस्न ओ इश्क़ में याराना हो गया कोई परी बना कोई दीवाना हो गया इतनी सी बात पर कि हुई शम्अ' बे-हिजाब तय्यार जान देने को परवाना हो गया तंग आ गया हूँ वुस्अत-ए-मफ़हूम-ए-इश्क़ से निकला जो हर्फ़ मुँह से वो अफ़्साना हो गया हर दिल में याद बन के छुपे हैं बुतान-ए-इश्क़ अल्लाह तेरा घर भी सनम-ख़ाना हो गया फ़ारिग़ तकल्लुफ़ात से हैं रिंद-ए-बे-रिया चुल्लू ही उन के वास्ते पैमाना हो गया तफ़्सील अपने जौर-ओ-सितम की न पूछिए क्या क्या न आप ने किया क्या क्या न हो गया देखी है जब से आँख किसी की फिरी हुई आलम मिरी निगाह में बेगाना हो गया ख़ुश हूँ कि हो रहा है ये इरशाद ले के दिल 'अहसन' क़ुबूल तेरा ये नज़राना हो गया — Ahsan Marahravi
दिल झुका माइल तबीअत हो गई आज बिस्मिल्लाह उल्फ़त हो गई महव दिल से सब शिकायत हो गई सामने जब उन की सूरत हो गई मेरा हाल-ए-ज़ार तो देखा मगर ये न पूछा क्यूँँ ये हालत हो गई वो फ़रेब-ए-नाज़ दे कर ले गए कितनी अर्ज़ां दिल की क़ीमत हो गई दिल में जब तक आह थी इक बात थी लब तक आते ही हिकायत हो गई जब न डाला उस ने आ कर कोई फूल गुल हमारी शम-ए-तुर्बत हो गई फ़ित्ना-साज़ी तक जो थी मश्क़ ख़िराम रफ़्ता रफ़्ता वो क़यामत हो गई कैसी मतलब-आश्ना थी चश्म-ए-शोख़ दिल उड़ाया और चम्पत हो गई चश्म पुर नम ने किया इफ़शा राज़ आबरू-ए-ज़ब्त ग़ारत हो गई दिल की चालों का नतीजा ये हुआ वक़्त से पहले क़यामत हो गई दे दिया दिल जिस को हम ने दे दिया हो गई जिस से मोहब्बत हो गई कह गए 'अहसन' के मुँह पर आज वो तेरी सूरत से भी नफ़रत हो गई — Ahsan Marahravi
इश्क़ करते हैं तो अहल-ए-इश्क़ यूँँ सौदा करें होश का सरमाया नज़्र-ए-हुस्न-ए-बे-परवा करें हम न हों लेकिन ज़माने में हमारा नाम हो ऐसी हस्ती चाहिए तो मर के हम पैदा करें है ख़ुद-आराई किसी की शान-ए-ख़ुद्दारी के साथ या'नी उन को हम न देखें वो हमें देखा करें दर्स-ए-इरफ़ाँ के लिए हर ज़र्रा है तूर-ए-कलीम देखने वाले मगर पहले नज़र पैदा करें शेख़ को जन्नत मुबारक हम को दोज़ख़ है क़ुबूल फ़िक्र-ए-उक़्बा वो करें हम ख़िदमत-ए-दुनिया करें एक दिल है एक हसरत एक हम हैं एक तुम इतने ग़म कम हैं जो कोई और ग़म पैदा करें 'अहसन'-ए-रंजूर को दुनिया से क्या है वास्ता आप ने बीमार डाला आप ही अच्छा करें — Ahsan Marahravi