Aitbar Sajid

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    ज़ख़्मों का दो-शाला पहना धूप को सर पर तान लिया
    क्या क्या हम ने कष्ट कमाए कहाँ कहाँ निरवान लिया

    नक़्श दिए तिरी आशाओं को अक्स दिए तिरे सपनों को
    लेकिन देख हमारी हालत वक़्त ने क्या तावान लिया

    अश्कों में हम गूँध चुके थे उस के लम्स की ख़ुशबू को
    मोम के फूल बनाने बैठे लेकिन धूप ने आन लिया

    बरसों ब'अद हमें देखा तो पहरों उस ने बात न की
    कुछ तो गर्द-ए-सफ़र से भाँपा कुछ आँखों से जान लिया

    आँख पे हात धरे फिरते थे लेकिन शहर के लोगों ने
    उस की बातें छेड़ के हम को लहजे से पहचान लिया

    सूरज सूरज खेल रहे थे 'साजिद' हम कल उस के साथ
    इक इक क़ौस-ए-क़ुज़ह से गुज़रे इक इक बादल छान लिया
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    आँखों से अयाँ ज़ख़्म की गहराई तो अब है
    अब आ भी चुको वक़्त-ए-मसीहाई तो अब है

    पहले ग़म-ए-फ़ुर्क़त के ये तेवर तो नहीं थे
    रग रग में उतरती हुई तन्हाई तो अब है

    तारी है तमन्नाओं पे सकरात का आलम
    हर साँस रिफ़ाक़त की तमन्नाई तो अब है

    कल तक मिरी वहशत से फ़क़त तुम ही थे आगाह
    हर गाम पे अंदेशा-ए-रुस्वाई तो अब है

    क्या जाने महकती हुई सुब्हों में कोई दिल
    शामों में किसी दर्द की रानाई तो अब है

    दिल-सोज़ ये तारे हैं तो जाँ-सोज़ ये महताब
    दर-असल शब-ए-अंजुमन-आराई तो अब है

    सफ़-बस्ता हैं हर मोड़ पे कुछ संग-ब-कफ़ लोग
    ऐ ज़ख़्म-ए-हुनर लुत्फ़-ए-पज़ीराई तो अब है
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    मिरा है कौन दुश्मन मेरी चाहत कौन रखता है
    इसी पर सोचते रहने की फ़ुर्सत कौन रखता है

    मकीनों के तअल्लुक़ ही से याद आती है हर बस्ती
    वगरना सिर्फ़ बाम-ओ-दर से उल्फ़त कौन रखता है

    नहीं है निर्ख़ कोई मेरे इन अशआर-ए-ताज़ा का
    ये मेरे ख़्वाब हैं ख़्वाबों की क़ीमत कौन रखता है

    दर-ए-ख़ेमा खुला रक्खा है गुल कर के दिया हम ने
    सो इज़्न-ए-आम है लो शौक़-रुख़्सत कौन रखता है

    मरे दुश्मन का क़द इस भीड़ में मुझ से तो ऊँचा हो
    यही में ढूँढता हूँ ऐसी क़ामत कौन रखता है

    हमारे शहर की रौनक़ है कुछ मशहूर लोगों से
    मगर सब जानते हैं कैसी शोहरत कौन रखता है
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    मुझ से मुख़्लिस था न वाक़िफ़ मिरे जज़्बात से था
    उस का रिश्ता तो फ़क़त अपने मफ़ादात से था

    अब जो बिछड़ा है तो क्या रोएँ जुदाई पे तिरी
    यही अंदेशा हमें पहली मुलाक़ात से था

    दिल के बुझने का हवाओं से गिला क्या करना
    ये दिया नज़्अ' के आलम में तो कल रात से था

    मरकज़-ए-शहर में रहने पे मुसिर थी ख़िल्क़त
    और मैं वाबस्ता तिरे दिल के मज़ाफ़ात से था

    मैं ख़राबों का मकीं और तअ'ल्लुक़ मेरा
    तेरे नाते कभी ख़्वाबों के महल्लात से था

    लब-कुशाई पे खुला उस के सुख़न से इफ़्लास
    कितना आरास्ता वो अत्लस-ओ-बानात से था
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    तिलिस्म-ज़ार-ए-शब-ए-माह में गुज़र जाए
    अब इतनी रात गए कौन अपने घर जाए

    अजब नशा है तिरे क़ुर्ब में कि जी चाहे
    ये ज़िंदगी तिरी आग़ोश में गुज़र जाए

    मैं तेरे जिस्म में कुछ इस तरह समा जाऊँ
    कि तेरा लम्स मिरी रूह में उतर जाए

    मिसाल-ए-बर्ग-ए-ख़िज़ाँ है हवा की ज़द पे ये दिल
    न जाने शाख़ से बिछड़े तो फिर किधर जाए

    मैं यूँ उदास हूँ इमशब कि जैसे रंग-ए-गुलाब
    ख़िज़ाँ की चाप से बे-साख़्ता उतर जाए

    हवा-ए-शाम-ए-जुदाई है और ग़म लाहक़
    न जाने जिस्म की दीवार कब बिखर जाए

    अगर न शब का सफ़र हो तिरे हुसूल की शर्त
    फ़रोग़-ए-महर तिरा ए'तिबार मर जाए
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    छोटे छोटे कई बे-फ़ैज़ मफ़ादात के साथ
    लोग ज़िंदा हैं अजब सूरत-ए-हालात के साथ

    फ़ैसला ये तो बहर-हाल तुझे करना है
    ज़ेहन के साथ सुलगना है कि जज़्बात के साथ

    गुफ़्तुगू देर से जारी है नतीजे के बग़ैर
    इक नई बात निकल आती है हर बात के साथ

    अब के ये सोच के तुम ज़ख़्म-ए-जुदाई देना
    दिल भी बुझ जाएगा ढलती हुई इस रात के साथ

    तुम वही हो कि जो पहले थे मिरी नज़रों में
    क्या इज़ाफ़ा हुआ इन अतलस ओ बानात के साथ

    इतना पसपा न हो दीवार से लग जाएगा
    इतने समझौते न कर सूरत-ए-हालात के साथ

    भेजता रहता है गुम-नाम ख़तों में कुछ फूल
    इस क़दर किस को मोहब्बत है मिरी ज़ात के साथ
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    घर की दहलीज़ से बाज़ार में मत आ जाना
    तुम किसी चश्म-ए-ख़रीदार में मत आ जाना

    ख़ाक उड़ाना इन्हीं गलियों में भला लगता है
    चलते फिरते किसी दरबार में मत आ जाना

    यूँही ख़ुशबू की तरह फैलते रहना हर सू
    तुम किसी दाम-ए-तलबगार में मत आ जाना

    दूर साहिल पे खड़े रह के तमाशा करना
    किसी उम्मीद के मंजधार में मत आ जाना

    अच्छे लगते हो कि ख़ुद-सर नहीं ख़ुद्दार हो तुम
    हाँ सिमट के बुत-ए-पिंदार में मत आ जाना

    चाँद कहता हूँ तो मतलब न ग़लत लेना तुम
    रात को रौज़न-ए-दीवार में मत आ जाना
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    धड़कन धड़कन यादों की बारात अकेला कमरा
    मैं और मेरे ज़ख़्मी एहसासात अकेला कमरा

    गए दिनों की तस्वीरों के बुझते हुए नुक़ूश
    ताज़ा तर्क-ए-तअल्लुक़ के सदमात अकेला कमरा

    दोश-ए-हवा पर उड़ने वाले ख़िज़ाँ के आख़िरी पत्ते
    अपनी अकेली जान ग़म-ए-हालात अकेला कमरा

    आख़िरी शब के चाँद से करना बालकनी में बातें
    उस के शहर में होटल की ये रात अकेला कमरा

    मेरी सिसकती आवाज़ों से गूँजती हैं दीवारें
    सुनता है दिन रात मरे नग़्मात अकेला कमरा

    सब सामान बहम हैं 'साजिद' लिखने लिखाने के
    ख़ून-ए-जिगर और आँसू दिल की दवात अकेला कमरा
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    जो ख़याल थे न क़यास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए
    जो मोहब्बतों की असास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए

    जिन्हें मानता ही नहीं ये दिल वही लोग मेरे हैं हम-सफ़र
    मुझे हर तरह से जो रास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए

    मुझे लम्हा-भर की रफ़ाक़तों के सराब और सताएँगे
    मिरी उम्र-भर की जो प्यास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए

    ये ख़याल सारे हैं आरज़ी ये गुलाब सारे हैं काग़ज़ी
    गुल-ए-आरज़ू की जो बास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए

    जिन्हें कर सका न क़ुबूल मैं वो शरीक-ए-राह-ए-सफ़र हुए
    जो मिरी तलब मिरी आस थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए

    मिरी धड़कनों के क़रीब थे मिरी चाह थे मिरा ख़्वाब थे
    वो जो रोज़-ओ-शब मिरे पास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए
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    तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो
    मैं बहुत दिनों से उदास हूँ मुझे कोई शाम उधार दो

    मुझे अपने रूप की धूप दो कि चमक सकें मिरे ख़ाल-ओ-ख़द
    मुझे अपने रंग में रंग दो मिरे सारे रंग उतार दो

    किसी और को मिरे हाल से न ग़रज़ है कोई न वास्ता
    मैं बिखर गया हूँ समेट लो मैं बिगड़ गया हूँ सँवार दो
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    Aitbar Sajid
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