हमारे बाद अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे
    बहारें हम को ढूँढेंगी न जाने हम कहाँ होंगे

    इसी अंदाज़ से झूमेगा मौसम गाएगी दुनिया
    मोहब्बत फिर हसीं होगी नज़ारे फिर जवाँ होंगे

    न हम होंगे न तुम होगे न दिल होगा मगर फिर भी
    हज़ारों मंज़िलें होंगी हज़ारों कारवाँ होंगे

    Majrooh Sultanpuri
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    पहले सौ बार इधर और उधर देखा है
    तब कहीं डर के तुम्हें एक नज़र देखा है

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    दिल की तमन्ना थी मस्ती में मंज़िल से भी दूर निकलते
    अपना भी कोई साथी होता हम भी बहकते चलते चलते

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    मुझ से कहा जिब्रील-ए-जुनूँ ने ये भी वही-ए-इलाही है
    मज़हब तो बस मज़हब-ए-दिल है बाक़ी सब गुमराही है

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    अलग बैठे थे फिर भी आँख साक़ी की पड़ी हम पर
    अगर है तिश्नगी कामिल तो पैमाने भी आएँगे

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    सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़
    जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले

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    ऐसे हँस हँस के न देखा करो सब की जानिब
    लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं

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    शब-ए-इंतिज़ार की कश्मकश में न पूछ कैसे सहर हुई
    कभी इक चराग़ जला दिया कभी इक चराग़ बुझा दिया

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    देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार
    रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख

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    मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
    लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया

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