तूफ़ान की उम्मीद थी आँधी नहीं आई
वो आप तो क्या उस की ख़बर भी नहीं आई
शायद वो मोहब्बत के लिए ठीक नहीं था
शायद ये अँगूठी उसे पूरी नहीं आई
बात करते हुए बे-ख़याली में ज़ुल्फ़ें खुली छोड़ दी
हम निहत्थों पे उसने ये कैसी बलाएँ खुली छोड़ दी
साथ जब तक रहे एक लम्हे को भी रब्त टूटा नहीं
उसने आँखें अगर बंद कर ली तो बाँहें खुले छोड़ दी
बातचीत में आला हो बस ठीक न हो
फ़ायदा क्या महबूब अगर बारीक न हो
हम तेरी क़ुर्बत में अक्सर सोचते हैं
दरिया खेत के इतना भी नज़दीक न हो
किए कराए का सारा हिसाब दूँगा मैं
सवाल जो भी करोगे जवाब दूँगा मैं
ये रख-रखाव कभी ख़त्म होने वाला नहीं
बिछड़ते वक़्त भी तुझको गुलाब दूँगा मैं
दवा से हल न हुआ तो दुआ पे छोड़ दिया
तिरा मोआमला हम ने ख़ुदा पे छोड़ दिया
बहुत ख़याल रखा मेरा और दरख़्तों का
फिर उस ने दोनों को आब-ओ-हवा पे छोड़ दिया
मुआफ़ वो करें जिन का क़ुसूर-वार है तू
अदालतों ने तुझे किस बिना पे छोड़ दिया
बग़ैर कुछ कहे मैं ने पलटने का सोचा
और एक फूल दर-ए-इल्तिजा पे छोड़ दिया
हम तो समझे थे मोहब्बत की लड़ाई साहब
आप तलवार उठा लाए हैं भाई साहब
धूप तालाब का हुलिया तो बदल सकती है
इतनी आसानी से छुटती नहीं काई साहब
ख़ाक को ख़ाक पे धरने का मज़ा अपना है
हिज्र में कौन बिछाता है चटाई साहब
फिर भी आवारगी ज़ाएअ नहीं जाने वाली
कोई भी चीज़ अगर हाथ न आई साहब