Swapnil Tiwari

Top 10 of Swapnil Tiwari

    इश्क़ की इक रंगीन सदा पर बरसे रंग
    रंग हो मजनूँ और लैला पर बरसे रंग
    Swapnil Tiwari
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    और कम याद आओगी अगले बरस तुम
    अब के कम याद आई हो पिछले बरस से
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    जलते दिए सा इक बोसा रख कर उस ने
    चमक बढ़ा दी है मेरी पेशानी की
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    धीरे धीरे ढलते सूरज का सफ़र मेरा भी है
    शाम बतलाती है मुझ को एक घर मेरा भी है

    जिस नदी का तू किनारा है उसी का मैं भी हूँ
    तेरे हिस्से में जो है वो ही भँवर मेरा भी है

    एक पगडंडी चली जंगल में बस ये सोच कर
    दश्त के उस पार शायद एक घर मेरा भी है

    फूटते ही एक अंकुर ने दरख़्तों से कहा
    आसमाँ इक चाहिए मुझ को कि सर मेरा भी है

    आज बेदारी मुझे शब भर ये समझाती रही
    इक ज़रा सा हक़ तुम्हारे ख़्वाबों पर मेरा भी है

    मेरे अश्कों में छुपी थी स्वाती की इक बूँद भी
    इस समुंदर में कहीं पर इक गुहर मेरा भी है

    शाख़ पर शब की लगे इस चाँद में है धूप जो
    वो मिरी आँखों की है सो वो समर मेरा भी है

    तू जहाँ पर ख़ाक उड़ाने जा रहा है ऐ जुनूँ
    हाँ उन्हीं वीरानियों में इक खंडर मेरा भी है

    जान जाते हैं पता 'आतिश' धुएँ से सब मिरा
    सोचता रहता हूँ क्या कोई मफ़र मेरा भी है
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    Swapnil Tiwari
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    तुम से इक दिन कहीं मिलेंगे हम
    ख़र्च ख़ुद को तभी करेंगे हम

    इश्क़! तुझ को ख़बर भी है? अब के
    तेरे साहिल से जा लगेंगे हम

    किस ने रस्ते में चाँद रक्खा है
    उस से टकरा के गिर पड़ेंगे हम

    आसमानों में घर नहीं होते
    मर गए तो कहाँ रहेंगे हम

    धूप निकली है तेरी बातों की
    आज छत पर पड़े रहेंगे हम

    जो भी कहना है उस को कहना है
    उस के कहने पे क्या कहेंगे हम

    रोक लेंगे मुझे तिरे आँसू
    ऐसे पानी पे क्या चलेंगे हम

    वो सुनेगी जो सुनना चाहेगी
    जो भी कहना है वो कहेंगे हम
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    कुछ भी नहीं होने की उलझन कुछ भी नहीं है तुम तो हो
    ऐ मेरे दिल दश्त की जोगन कुछ भी नहीं है तुम तो हो

    तुम से एक धनक फूटेगी और कमरे में बिखरेगी
    दीवारों पे रंग न रोग़न कुछ भी नहीं है तुम तो हो

    इक दर्पन जो ठीक मिरे दिल ही के अंदर खुलता है
    देख रहा हूँ मैं वो दर्पन कुछ भी नहीं है तुम तो हो

    मेरे ख़यालों की दुनिया में कुछ भी नहीं जानाँ लेकिन
    कम नहीं करना अपनी बन-ठन कुछ भी नहीं है तुम तो हो
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    तुमसे इक दिन कहीं मिलेंगे हम
    ख़र्च ख़ुद को तभी करेंगे हम

    धूप निकली है तेरी बातों की
    आज छत पर पड़े रहेंगे हम
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    गली में बैठे हैं उसकी नज़र जमाए हुए
    हमारे बस में फ़क़त इंतिज़ार करना है
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    हमारी आख़िरी सिगरेट थी ये अरे दुनिया
    जो तुझ पे ग़ुस्से में हमने अभी जला ली है
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    मैं रोज़ रात यही सोच कर तो सोता हूँ
    कि कल से वक़्त निकालूँगा ज़िन्दगी के लिए
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