dheere dheere dhalti suraj ka safar miraa bhi hai | धीरे धीरे ढलते सूरज का सफ़र मेरा भी है

  - Swapnil Tiwari

धीरे धीरे ढलते सूरज का सफ़र मेरा भी है
शाम बतलाती है मुझ को एक घर मेरा भी है

जिस नदी का तू किनारा है उसी का मैं भी हूँ
तेरे हिस्से में जो है वो ही भँवर मेरा भी है

एक पगडंडी चली जंगल में बस ये सोच कर
दश्त के उस पार शायद एक घर मेरा भी है

फूटते ही एक अंकुर ने दरख़्तों से कहा
आसमाँ इक चाहिए मुझ को कि सर मेरा भी है

आज बेदारी मुझे शब भर ये समझाती रही
इक ज़रा सा हक़ तुम्हारे ख़्वाबों पर मेरा भी है

मेरे अश्कों में छुपी थी स्वाती की इक बूँद भी
इस समुंदर में कहीं पर इक गुहर मेरा भी है

शाख़ पर शब की लगे इस चाँद में है धूप जो
वो मिरी आँखों की है सो वो समर मेरा भी है

तू जहाँ पर ख़ाक उड़ाने जा रहा है ऐ जुनूँ
हाँ उन्हीं वीरानियों में इक खंडर मेरा भी है

जान जाते हैं पता 'आतिश' धुएँ से सब मिरा
सोचता रहता हूँ क्या कोई मफ़र मेरा भी है

  - Swapnil Tiwari

Sooraj Shayari

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