इतनी काली रात है घर में
फ़र्क़ नहीं आँख और मंज़र में
ऐसी लंबी नींद है मेरी
कीड़े पड़ गए हैं बिस्तर में
आधी रात इक ख़्वाब ने आ कर
आग लगा दी है चादर में
उस के सारे बंदे मर गए
अब वो ख़ुदा है अजायबघर में
शाख़-ए-ख़ुदा पे हैं पत्ते इस के
आदमी की जड़ है बंदर में
— Swapnil Tiwari















