जी बहलता ही नहीं ख़ाली क़फ़स से
रंग जैसे उड़ गए हों कैनवस से
और कम याद आओगी अगले बरस तुम
अब के कम याद आई हो पिछले बरस से
फिर बचा जो चाँद वो मैं पी गया था
सब हुए मदहोश जूँ ही उस चरस से
— Swapnil Tiwari
रंग जैसे उड़ गए हों कैनवस से
और कम याद आओगी अगले बरस तुम
अब के कम याद आई हो पिछले बरस से
फिर बचा जो चाँद वो मैं पी गया था
सब हुए मदहोश जूँ ही उस चरस से
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