Tahir Faraz

Tahir Faraz

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Tahir Faraz shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Tahir Faraz's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ज़िंदगी तेरे तअक़्क़ुब में हम इतना चलते हैं कि मर जाते हैं — Tahir Faraz
जब कभी बोलना वक़्त पर बोलना मुद्दतों सोचना मुख़्तसर बोलना — Tahir Faraz
नज़र बचा के गुज़रते हो तो गुज़र जाओ मैं आइना हूँ मेरी अपनी ज़िम्मेदारी है — Tahir Faraz
वो सर भी काट देता तो होता न कुछ मलाल अफ़्सोस ये है उस ने मेरी बात काट दी — Tahir Faraz
जम्अ'' करता जो मैं आए हुए संग सर छुपाने के लिए घर होता — Tahir Faraz
इस बुलंदी पे बहुत तन्हा हूँ काश मैं सब के बराबर होता — Tahir Faraz
तमाम दिन के दुखों का हिसाब करना है मैं चाहता हूँ कोई मेरे आस-पास न हो — Tahir Faraz
काश ऐसा कोई मंज़र होता मेरे काँधे पे तेरा सर होता — Tahir Faraz

Ghazal

अजीब हम हैं सबब के बग़ैर चाहते हैं तुम्हें तुम्हारी तलब के बग़ैर चाहते हैं फ़क़ीर वो हैं जो अल्लाह तेरे बंदों को हर इम्तियाज़-ए-नसब के बग़ैर चाहते हैं मज़ा तो ये है उन्हें भी नवाज़ता है रब जो इस जहान को रब के बग़ैर चाहते हैं नहीं है खेल कोई उन से गुफ़्तुगू करना सुख़न वो जुम्बिश-ए-लब के बग़ैर चाहते हैं ठठुरती रात में चादर भी जिन के पास नहीं वो दिन निकालना शब के बग़ैर चाहते हैं जमी है गर्द सियासत की जिन के ज़ेहनों पर मुशाएरा भी अदब के बग़ैर चाहते हैं है ए'तिमाद उन्हें ख़ुद पर ग़ुरूर की हद तक अकेले जीना जो सब के बग़ैर चाहते हैं — Tahir Faraz
थे जितने ख़ुशनुमा मंज़र बदलते जा रहे हैं हमारे अहद के महताब ढलते जा रहे हैं सफ़र में कुछ न कुछ तो भूल मुझ सेे भी हुई है जो पीछे थे मिरे आगे निकलते जा रहे हैं कोई सूरज मिरे अंदर उतरता जा रहा है जमें दरिया भी आँखों के पिघलते जा रहे हैं हुआ है हुक्म चलने का अधूरे ख़्वाब ले कर कई बेदार-ए-शब आँखों को मलते जा रहे हैं अब उस की गुफ़्तगू में भी तकल्लुफ़ आ गया है सो अब हम भी मोहब्बत में सॅंभलते जा रहे हैं हमें इक फूल की ख़ुशबू से निस्बत हो गई थी नतीजा ये है अब काँटों पे चलते जा रहे हैं मिरे घर मुझ को पहुॅंचाने मिरे अहबाब सारे लिए जाते है पर कांधे बदलते जा रहे हैं — Tahir Faraz
सुकून-ए-दिल में वो बन के जब इंतिशार उतरा तो मैं ने देखा न देखता पर लहू में वो बार बार उतरा तो मैं ने देखा न आँसुओं ही में वो चमक थी न दिल की धड़कन में वो कसक थी सहर के होते ही नश्शा-ए-हिज्र-ए-यार उतरा तो मैं ने देखा उदास आँखों से तक रहा था मुझे वो छूटा हुआ किनारा शिकस्ता कश्ती से जब मैं दरिया के पार उतरा तो मैं ने देखा जो बर्फ़ आँखों में जम चुकी थी वो धीरे धीरे पिघल रही थी जब आइने में वो मेरा आईना-दार उतरा तो मैं ने देखा थे जितने वहम-ओ-गुमान वो सब नई हक़ीक़त में ढल चुके थे इक आदमी पर कलाम-ए-परवरदिगार उतरा तो मैं ने देखा न जाने कब से सिसक रहा था क़रीब आते झिजक रहा था मकाँ की दहलीज़ से वो जब अश्क-बार उतरा तो मैं ने देखा ख़याल-ए-जानाँ तिरी बदौलत 'फ़राज़' है कितना ख़ूब-सूरत दिमाग़-ओ-दिल से हक़ीक़तों का ग़ुबार उतरा तो मैं ने देखा — Tahir Faraz
में न कहता था कि शहरों में न जा यार मिरे सोंधी मिट्टी ही में होती है वफ़ा यार मिरे कोई टूटे हुए ख़्वाबों से कहाँ मिलता है हर जगह दर्द का बिस्तर न लगा यार मिरे सिलसिला फिर से जुड़ा है तो जुड़ा रहने दे दिल के रिश्तों को तमाशा न बना यार मिरे अपनी चाहत के शब-ओ-रोज़ मुकम्मल कर ले जा ये सूरज भी तिरे नाम किया यार मिरे तुझ से मिलता हूँ तो रिश्ता कोई याद आता है सिलसिला मुझ से ज़ियादा न बढ़ा यार मिरे ऐसा लगता है कि कुछ टूट रहा है मुझ में छोड़ के तू मुझे इस वक़्त न जा यार मिरे ख़ुश-नसीबी से ये साअ'त तिरे हाथ आई है आसमाँ झुकने लगा हाथ बढ़ा यार मिरे — Tahir Faraz
मिरी मंज़िलें कहीं और हैं मिरा रास्ता कोई और है हटो राह से मिरी ख़िज़्र-जी मिरा रहनुमा कोई और है ये अजीब मंतिक़-ए-इश्क़ है मगर इस में कुछ भी न बन पड़े मिरे दिल में याद किसी की है मुझे भूलता कोई और है मिरी जुम्बिशें मिरी लग़्ज़िशें मिरे बस में होंगी न थीं न हैं मैं क़याम करता हूँ ज़ेहन में मुझे सोचता कोई और है तिरे हुस्न तेरे जमाल का मैं दिवाना यूँँ ही नहीं हुआ है मुझे ख़बर तिरे रूप में ये छुपा हुआ कोई और है नहीं मुझ को तुझ से कोई गिला है अलग तरह मिरा सिलसिला कि तिरे ख़ुदा कई और हैं तो मिरा ख़ुदा कोई और है — Tahir Faraz
कोई हसीं मंज़र आँखों से जब ओझल हो जाएगा मुझ को पागल कहने वाला ख़ुद ही पागल हो जाएगा पलकों पे उस की जले बुझेंगे जुगनू जब मिरी यादों के कमरे में होंगी बरसातें घर जंगल हो जाएगा जिस दिन उस की ज़ुल्फ़ें उस के शानों पर खुल जाएँगी उस दिन शर्म से पानी पानी ख़ुद बादल हो जाएगा जब भी वो पाकीज़ा दामन आ जाएगा हाथ मिरे आँखों का ये मेला पानी गंगा-जल हो जाएगा उस की यादें उस की बातें उस की वफ़ाएँ उस का प्यार किस को ख़बर थी जीना मुश्किल एक इक पल हो जाएगा मत घबरा ऐ प्यासे दरिया सूरज आने वाला है बर्फ़ पहाड़ों से पिघली तो जल ही जल हो जाएगा — Tahir Faraz

Nazm

बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदा रा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम — Tahir Faraz
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम — Tahir Faraz