थे जितने ख़ुशनुमा मंज़र बदलते जा रहे हैं
हमारे अहद के महताब ढलते जा रहे हैं
सफ़र में कुछ न कुछ तो भूल मुझ से भी हुई है
जो पीछे थे मिरे आगे निकलते जा रहे हैं
कोई सूरज मिरे अंदर उतरता जा रहा है
जमें दरिया भी आँखों के पिघलते जा रहे हैं
हुआ है हुक्म चलने का अधूरे ख़्वाब ले कर
कई बेदार-ए-शब आँखों को मलते जा रहे हैं
अब उस की गुफ़्तगू में भी तकल्लुफ़ आ गया है
सो अब हम भी मोहब्बत में सॅंभलते जा रहे हैं
हमें इक फूल की ख़ुशबू से निस्बत हो गई थी
नतीजा ये है अब काँटों पे चलते जा रहे हैं
मिरे घर मुझ को पहुॅंचाने मिरे अहबाब सारे
लिए जाते है पर कांधे बदलते जा रहे हैं
— Tahir Faraz















