Ambreen Haseeb Ambar

Ambreen Haseeb Ambar

@ambreen-haseeb-ambar

Ambreen Haseeb Ambar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ambreen Haseeb Ambar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

इक हसीं ख़्वाब कि आँखों से निकलता ही नहीं एक वहशत है कि ता'बीर हुई जाती है — Ambreen Haseeb Ambar
तुम ने किस कैफ़ियत में मुख़ातब किया कैफ़ देता रहा लफ़्ज़-ए-'तू' देर तक — Ambreen Haseeb Ambar
क्या ख़ूब तमाशा है ये कार-गह-ए-हस्ती हर जिस्म सलामत है हर ज़ात अधूरी है — Ambreen Haseeb Ambar
जो तुम हो तो ये कैसे मान लूँ मैं कि जो कुछ है यहाँ बस इक गुमाँ है — Ambreen Haseeb Ambar
ध्यान में आ कर बैठ गए हो तुम भी नाँ मुझे मुसलसल देख रहे हो तुम भी नाँ — Ambreen Haseeb Ambar
बन के हँसी होंटों पर भी रहते हो अश्कों में भी तुम बहते हो तुम भी ना — Ambreen Haseeb Ambar
उम्र-भर के सज्दों से मिल नहीं सकी जन्नत ख़ुल्द से निकलने को इक गुनाह काफ़ी है — Ambreen Haseeb Ambar
उड़ गए सारे परिंदे मौसमों की चाह में इंतिज़ार उन का मगर बूढे शजर करते रहे — Ambreen Haseeb Ambar
तअल्लुक़ जो भी रक्खो सोच लेना कि हम रिश्ता निभाना जानते हैं — Ambreen Haseeb Ambar
फ़ैसला बिछड़ने का कर लिया है जब तुम ने फिर मिरी तमन्ना क्या फिर मिरी इजाज़त क्यूँँ — Ambreen Haseeb Ambar
ऐ आसमाँ किस लिए इस दर्जा बरहमी हम ने तो तिरी सम्त इशारा नहीं किया — Ambreen Haseeb Ambar
वो जंग जिस में मुक़ाबिल रहे ज़मीर मिरा मुझे वो जीत भी 'अंबर' न होगी हार से कम — Ambreen Haseeb Ambar
भूल जोते हैं मुसाफ़िर रस्ता लोग कहते हैं कहानी फिर भी — Ambreen Haseeb Ambar
ज़िंदगी में कभी किसी को भी मैं ने चाहा नहीं मगर तुम को — Ambreen Haseeb Ambar
दिल जिन को ढूँढ़ता है न-जाने कहाँ गए ख़्वाब-ओ-ख़याल से वो ज़माने कहाँ गए — Ambreen Haseeb Ambar
इस आरज़ी दुनिया में हर बात अधूरी है हर जीत है ला-हासिल हर मात अधूरी है — Ambreen Haseeb Ambar
हम तो सुनते थे कि मिल जाते हैं बिछड़े हुए लोग तू जो बिछड़ा है तो क्या वक़्त ने गर्दिश नहीं की — Ambreen Haseeb Ambar
दुनिया तो हम से हाथ मिलाने को आई थी हम ने ही ए'तिबार दोबारा नहीं किया — Ambreen Haseeb Ambar
मुझ में अब मैं नहीं रही बाक़ी मैं ने चाहा है इस क़दर तुम को — Ambreen Haseeb Ambar

Ghazal

जब से ज़िंदगी हुआ दिल गर्दिश-ए-तक़दीर का रोज़ बढ़ जाता है इक हल्क़ा मिरी ज़ंजीर का मेरे हिस्से में कहाँ थीं उजलतों की मंज़िलें मेरे क़दमों को सदा रस्ता मिला ताख़ीर से किस लिए बर्बादियों का दिल को है इतना मलाल और क्या अंदाज़ा हो ख़म्याज़ा-ए-ता'मीर का ख़ून-ए-दिल जिन की गवाही में हुआ नज़्र-ए-वफ़ा रंग तो वो उड़ गए अब क्या करूँँ तस्वीर का मैं ने समझा तेरी चाहत को फ़क़त इनआ'म-ए-ज़ीस्त मुझ को अंदाज़ा न था इस जुर्म इस ता'ज़ीर का एक लब तक ही न पहुँची जो दुआ थी मुस्तजाब किस क़दर चर्चा हुआ है आह-ए-बे-तासीर का लफ़्ज़ की हुरमत मुक़द्दम है दिल-ओ-जाँ से मुझे सच तआ'रुफ़ है मिरे हर शे'र हर तहरीर का — Ambreen Haseeb Ambar
ज़मीं पे इंसाँ ख़ुदा बना था वबास पहले वो ख़ुद को सब कुछ समझ रहा था वबास पहले पलक झपकते ही सारा मंज़र बदल गया है यहाँ तो मेला लगा हुआ था वबास पहले तुम आज हाथों से दूरियाँ नापते हो सोचो दिलों में किस दर्जा फ़ासला था वबास पहले अजीब सी दौड़ में सब ऐसे लगे हुए थे मकाँ मकीनों को ढूँढ़ता था वबास पहले हम आज ख़ल्वत में इस ज़माने को रो रहे हैं वो जिस से सब को बहुत गिला था वबास पहले न जाने क्यूँ आ गया दुआ में मिरी वो बच्चा सड़क पे जो फूल बेचता था वबास पहले दुआ को उट्ठे हैं हाथ 'अंबर' तो ध्यान आया ये आसमाँ सुर्ख़ हो चुका था वबास पहले — Ambreen Haseeb Ambar
ऐ ख़ुदा अजब है तिरा जहाँ मिरा दिल यहाँ पे लगा नहीं जहाँ कोई अहल-ए-वफ़ा नहीं किसी लब पे हर्फ़-ए-दुआ नहीं बड़ा शोर था तिरे शहर का सो गुज़ार आए हैं दिन वहाँ वो सकूँ कि जिस की तलाश है तिरे शहर में भी मिला नहीं ये जो हश्र बरपा है हर तरफ़ तो बस इस का है यही इक सबब है लबों पे नाम-ए-ख़ुदा मगर किसी दिल में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा नहीं जो हँसी है लब पे सजी हुई तो ये सिर्फ़ ज़ब्त का फ़र्क़ है मिरे दिल में भी वही ज़ख़्म हैं मिरा हाल तुझ से जुदा नहीं ये जो दश्त-ए-दिल में हैं रौनक़ें ये तिरी अता के तुफ़ैल हैं दिया ज़ख़्म जो वो हरा रहा जो दिया जला वो बुझा नहीं ऐ ख़ुदा अजब है तिरी रज़ा कोई भेद इस का न पा सका कि मिला तो मिल गया बे-तलब जिसे माँगते थे मिला नहीं वो जो हर्फ़-ए-हक़ था लिखा गया किसी शाम ख़ून से रेत पर है गवाह मौजा-ए-वक़्त भी कि वो हर्फ़ उस से मिटा नहीं — Ambreen Haseeb Ambar
वो मसीहा न बना हम ने भी ख़्वाहिश नहीं की अपनी शर्तों पे जिए उस से गुज़ारिश नहीं की उस ने इक रोज़ किया हम से अचानक वो सवाल धड़कनें थम सी गईं वक़्त ने जुम्बिश नहीं की किस लिए बुझने लगे अव्वल-ए-शब सारे चराग़ आँधियों ने भी अगरचे कोई साज़िश नहीं की अब के हम ने भी दिया तर्क-ए-त'अल्लुक़ का जवाब होंट ख़ामोश रहे आँख ने बारिश नहीं की हम तो सुनते थे कि मिल जाते हैं बिछड़े हुए लोग तू जो बिछड़ा है तो क्या वक़्त ने गर्दिश नहीं की उस ने ज़ाहिर न किया अपना पशेमाँ होना हम भी अंजान रहे हम ने भी पुर्सिश नहीं की — Ambreen Haseeb Ambar
ध्यान में आ कर बैठ गए हो तुम भी ना मुझे मुसलसल देख रहे हो तुम भी ना दे जाते हो मुझ को कितने रंग नए जैसे पहली बार मिले हो तुम भी ना हर मंज़र में अब हम दोनों होते हैं मुझ में ऐसे आन बसे हो तुम भी ना इश्क़ ने यूँँ दोनों को आमेज़ किया अब तो तुम भी कह देते हो तुम भी ना ख़ुद ही कहो अब कैसे सँवर सकती हूँ मैं आईने में तुम होते हो तुम भी ना बन के हँसी होंटों पर भी रहते हो अश्कों में भी तुम बहते हो तुम भी ना मेरी बंद आँखें तुम पढ़ लेते हो मुझ को इतना जान चुके हो तुम भी ना माँग रहे हो रुख़्सत और अब ख़ुद ही हाथ में हाथ लिए बैठे हो तुम भी ना — Ambreen Haseeb Ambar