Dushyant Kumar

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@dushyant-kumar

Dushyant Kumar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Dushyant Kumar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

यहाँ दरख़्तों के साए में धूप लगती है चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए — Dushyant Kumar
इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है — Dushyant Kumar
एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ आज अपने बाजुओं को देख पतवारें न देख — Dushyant Kumar
फिरता है कैसे-कैसे सवालों के साथ वो उस आदमी की जामा-तलाशी तो लीजिए — Dushyant Kumar
आप दस्ताने पहनकर छू रहे हैं आग को आप के भी ख़ून का रंग हो गया है साँवला — Dushyant Kumar
ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुआ होगा मैं सजदे में नहीं था आप को धोखा हुआ होगा — Dushyant Kumar
तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं — Dushyant Kumar
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए — Dushyant Kumar
कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता एक पत्थर तो तबीअ'त से उछालो यारो — Dushyant Kumar
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए — Dushyant Kumar
भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुद्दआ' — Dushyant Kumar
एक आदत सी बन गई है तू और आदत कभी नहीं जाती — Dushyant Kumar
हम ने सोचा था जवाब आएगा एक बेहूदा सवाल आया है — Dushyant Kumar
रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो — Dushyant Kumar
कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं — Dushyant Kumar
कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए कहाँ चराग़ मुयस्सर नहीं शहर के लिए — Dushyant Kumar

Ghazal

पाँवों से सिर तक जैसे एक जनून बेतरतीबी से बढ़े हुए नाखून कुछ टेढ़े-मेढ़े बैंगे दागिल पाँव जैसे कोई एटम से उजड़ा गाँव। टखने ज्यूँ मिले हुए रक्खे हों बाँस पिंडलियाँ कि जैसे हिलती-डुलती काँस कुछ ऐसे लगते हैं घुटनों के जोड़ जैसे ऊबड़-खाबड़ राहों के मोड़ गट्टों-सी जंघाएँ निष्प्राण मलीन कटि, रीतिकाल की सुधियों से भी क्षीण छाती के नाम महज़ हड्डी दस-बीस जिस पर गिन-चुन कर बाल खड़े इक्कीस पुट्ठे हों जैसे सूख गए अमरूद चुकता करते-करते जीवन का सूद बाँहें ढीली-ढाली ज्यूँ टूटी डाल अँगुलियाँ जैसे सूखी हुई पुआल छोटी-सी गरदन रंग बेहद बदरंग हर वक़्त पसीने का बदबू का संग पिचकी अमियों से गाल लटे से कान आँखें जैसे तरकश के खुट्टल बान माथे पर चिंताओं का एक समूह भौंहों पर बैठी हरदम यम की रूह तिनकों से उड़ते रहने वाले बाल विद्युत परिचालित मखनातीसी चाल बैठे तो फिर घंटों जाते हैं बीत सोचते प्यार की रीत भविष्य अतीत कितने अजीब हैं इन के भी व्यापार इनसे मिलिए ये हैं दुष्यंत कुमार — Dushyant Kumar

Nazm

मैं फिर जनम लूँगा फिर मैं इसी जगह आऊँगा उचटती निगाहों की भीड़ में अभावों के बीच लोगों की क्षत-विक्षत पीठ सहलाऊँगा लँगड़ाकर चलते हुए पावों को कंधा दूँगा गिरी हुई पद-मर्दित पराजित विवशता को बाँहों में उठाऊँगा इस समूह में इन अनगिनत अनचीन्ही आवाजों में कैसा दर्द है कोई नहीं सुनता! पर इन आवाजों को और इन कराहों को दुनिया सुने मैं ये चाहूँगा मेरी तो आदत है रौशनी जहाँ भी हो उसे खोज लाऊँगा कातरता, चुप्पी या चीखें, या हारे हुओं की खीज जहाँ भी मिलेगी उन्हें प्यार के सितार पर बजाऊँगा जीवन ने कई बार उकसाकर मुझे अनुल्लंघ्य सागरों में फेंका है अगन-भट्ठियों में झोंका है, मैं ने वहाँ भी ज्योति की मशाल प्राप्त करने के यत्न किए बचने के नहीं, तो क्या इन टटकी बंदूकों से डर जाऊँगा ? तुम मुझ को दोषी ठहराओ मैं ने तुम्हारे सुनसान का गला घोंटा है पर मैं गाऊँगा चाहे इस प्रार्थना सभा में तुम सब मुझ पर गोलियाँ चलाओ मैं मर जाऊँगा लेकिन मैं कल फिर जनम लूँगा कल फिर आऊँगा — Dushyant Kumar