Tahir Faraz

Top 10 of Tahir Faraz

    बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
    कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से
    तो मुझ को ख़ुदा रा ग़लत मत समझना
    कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
    हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी
    हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी
    जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ
    सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी
    नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना
    किसी और से देखो दिल मत लगाना
    कि मेरी अमानत हो तुम
    बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
    है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा
    है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा
    और इस पर ये काली घटाओं का पहरा
    गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है
    ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है
    बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल
    फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल
    वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
    जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर
    शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर
    जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे
    जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के
    छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए
    भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए
    वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
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    Tahir Faraz
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    जिस ने तेरी याद में सज्दे किए थे ख़ाक पर
    उस के क़दमों के निशाँ पाए गए अफ़्लाक पर

    वाक़िआ' ये कुन-फ़काँ से भी बहुत पहले का है
    इक बशर का नूर था क़िंदील में अफ़्लाक पर

    दोस्तों की महफ़िलों से दूर हम होते गए
    जैसे जैसे सिलवटें पड़ती गईं पोशाक पर

    मख़मली होंटों पे बोसों की नमी ठहरी हुई
    साँस उलझी ज़ुल्फ़ बिखरी सिलवटें पोशाक पर

    पानियों की साज़िशों ने जब भँवर डाले 'फ़राज़'
    तब्सिरा करते रहे सब डूबते तैराक पर
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    दर्द ख़ामोश रहा टूटती आवाज़ रही
    मेरी हर शाम तिरी याद की हमराज़ रही

    शहर में जब भी चले ठंडी हवा के झोंके
    तपते सहरा की तबीअ'त बड़ी ना-साज़ रही

    आइने टूट गए अक्स की सच्चाई पर
    और सच्चाई हमेशा की तरह राज़ रही

    इक नए मोड़ पे उस ने भी मुझे छोड़ दिया
    जिस की आवाज़ में शामिल मिरी आवाज़ रही

    सुनता रहता हूँ बुज़ुर्गों से मैं अक्सर 'ताहिर'
    वो समाअ'त ही रही और न वो आवाज़ रही
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    Tahir Faraz
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    मिरे लबों पे उसी आदमी की प्यास न हो
    जो चाहता है मिरे सामने गिलास न हो

    ये तिश्नगी तो मिली है हमें विरासत में
    हमारे वास्ते दरिया कोई उदास न हो

    तमाम दिन के दुखों का हिसाब करना है
    मैं चाहता हूँ कोई मेरे आस-पास न हो

    मुझे भी दुख है ख़ता हो गया निशाना तिरा
    कमान खींच मैं हाज़िर हूँ तू उदास न हो

    ग़ज़ल ही रह गई ताहिर-'फ़राज़' अपने लिए
    जहाँ में कोई ऐसा भी बे-असास न हो
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    ग़म इस का कुछ नहीं है कि मैं काम आ गया
    ग़म ये है क़ातिलों में तिरा नाम आ गया

    जुगनू जले बुझे मिरी पलकों पे सुब्ह तक
    जब भी तिरा ख़याल सर-ए-शाम आ गया

    महसूस कर रहा हूँ मैं ख़ुशबू की बाज़गश्त
    शायद तिरे लबों पे मिरा नाम आ गया

    कुछ दोस्तों ने पूछा बताओ ग़ज़ल है क्या
    बे-साख़्ता लबों पे तिरा नाम आ गया

    मैं ने तो एक लाश की दी थी ख़बर 'फ़राज़'
    उल्टा मुझी पे क़त्ल का इल्ज़ाम आ गया
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    गोशे बदल बदल के हर इक रात काट दी
    कच्चे मकाँ में अब के भी बरसात काट दी

    वो सर भी काट देता तो होता न कुछ मलाल
    अफ़्सोस ये है उस ने मिरी बात काट दी

    दिल भी लहूलुहान है आँखें भी हैं उदास
    शायद अना ने शह-रग-ए-जज़्बात काट दी

    जब भी हमें चराग़ मयस्सर न आ सका
    सूरज के ज़िक्र से शब-ए-ज़ुल्मात काट दी

    जादूगरी का खेल अधूरा ही रह गया
    दरवेश ने शबीह-ए-तिलिस्मात काट दी

    हालाँकि हम मिले थे बड़ी मुद्दतों के बा'द
    औक़ात की कमी ने मुलाक़ात काट दी

    ठंडी हवाएँ महकी फ़ज़ा नर्म चाँदनी
    शब तो बस एक थी जो तिरे सात काट दी
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    Tahir Faraz
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    आप हमारे साथ नहीं
    चलिए कोई बात नहीं

    आप किसी के हो जाएँ
    आप के बस की बात नहीं

    अब हम को आवाज़ न दो
    अब ऐसे हालात नहीं

    इस दुनिया के नक़्शे में
    शहर तो हैं देहात नहीं

    सब है गवारा हम को मगर
    तौहीन-ए-जज़्बात नहीं

    हम को मिटाना मुश्किल है
    सदियाँ हैं लम्हात नहीं

    ज़ालिम से डरने वाले
    क्या तेरे दो हाथ नहीं
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    वो सर भी काट देता तो होता न कुछ मलाल
    अफ़्सोस ये है उस ने मिरी बात काट दी
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    बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
    कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से
    तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना
    कि मेरी ज़रूरत हो तुम
    बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

    हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी
    हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी
    जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ
    सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी
    नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना
    किसी और से देखो दिल मत लगाना
    कि मेरी अमानत हो तुम
    बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम...

    कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा
    चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा
    ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा
    मचलते हुए आबसारों में ढूँडा
    हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा
    न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा
    न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया
    जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया
    एक ऐसी मसर्रत हो तुम
    बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

    है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा
    है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा
    और इस पर ये काली घटाओं का पहरा
    गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है
    ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है
    बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल
    फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल
    वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

    जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर
    शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर
    जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे
    जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के
    छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए
    भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए

    वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
    बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
    बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
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    Tahir Faraz
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    काश ऐसा कोई मंजर होता
    मेरे काँधे पे तेरा सर होता
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