नहीं हर चंद किसी गुम-शुदा जन्नत की तलाश
    इक न इक ख़ुल्द-ए-तरब-नाक का अरमाँ है ज़रूर

    बज़्म-ए-दोशंबा की हसरत तो नहीं है मुझ को
    मेरी नज़रों में कोई और शबिस्ताँ है ज़रूर
    Read Full
    Asrar Ul Haq Majaz
    19 Likes
    ये क़त्ल-ए-आम और बे-इज़्न क़त्ल-ए-आम क्या कहिए
    ये बिस्मिल कैसे बिस्मिल हैं जिन्हें क़ातिल नहीं मिलता

    वहाँ कितनों को तख़्त ओ ताज का अरमाँ है क्या कहिए
    जहाँ साइल को अक्सर कासा-ए-साइल नहीं मिलता
    Read Full
    Asrar Ul Haq Majaz
    19 Likes
    फिर किसी के सामने चश्म-ए-तमन्ना झुक गई
    शौक़ की शोख़ी में रंग-ए-एहतराम आ ही गया
    Asrar Ul Haq Majaz
    21 Likes
    इश्क़ को पूछता नहीं कोई
    हुस्न का एहतिराम होता है
    Asrar Ul Haq Majaz
    50 Likes
    हुस्न को शर्मसार करना ही
    इश्क़ का इंतिक़ाम होता है
    Asrar Ul Haq Majaz
    32 Likes
    इश्क़ का ज़ौक़-ए-नज़ारा मुफ़्त में बदनाम है
    हुस्न ख़ुद बे-ताब है जल्वा दिखाने के लिए
    Asrar Ul Haq Majaz
    39 Likes
    बख़्शी हैं हम को इश्क़ ने वो जुरअतें 'मजाज़'
    डरते नहीं सियासत-ए-अहल-ए-जहाँ से हम
    Asrar Ul Haq Majaz
    31 Likes
    बताऊँ क्या तुझे ऐ हम-नशीं किस से मोहब्बत है
    मैं जिस दुनिया में रहता हूँ वो इस दुनिया की औरत है
    Asrar Ul Haq Majaz
    55 Likes
    जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है
    मगर वो आज भी बरहम नहीं है

    बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना
    तिरी ज़ुल्फ़ों का पेच-ओ-ख़म नहीं है

    बहुत कुछ और भी है इस जहाँ में
    ये दुनिया महज़ ग़म ही ग़म नहीं है

    तक़ाज़े क्यूँ करूँ पैहम न साक़ी
    किसे याँ फ़िक्र-ए-बेश-ओ-कम नहीं है

    उधर मश्कूक है मेरी सदाक़त
    इधर भी बद-गुमानी कम नहीं है

    मिरी बर्बादियों का हम-नशीनो
    तुम्हें क्या ख़ुद मुझे भी ग़म नहीं है

    अभी बज़्म-ए-तरब से क्या उठूँ मैं
    अभी तो आँख भी पुर-नम नहीं है

    ब-ईं सैल-ए-ग़म ओ सैल-ए-हवादिस
    मिरा सर है कि अब भी ख़म नहीं है

    'मजाज़' इक बादा-कश तो है यक़ीनन
    जो हम सुनते थे वो आलम नहीं है
    Read Full
    Asrar Ul Haq Majaz
    4 Likes
    तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन
    तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था
    Asrar Ul Haq Majaz
    30 Likes

Top 10 of Similar Writers