ये क़त्ल-ए-आम और बे-इज़्न क़त्ल-ए-आम क्या कहिए ये बिस्मिल कैसे बिस्मिल हैं जिन्हें क़ातिल नहीं मिलतावहाँ कितनों को तख़्त ओ ताज का अरमाँ है क्या कहिएजहाँ साइल को अक्सर कासा-ए-साइल नहीं मिलता— Asrar Ul Haq Majaz