junoon-e-shauq ab bhi kam nahin hai | जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है

  - Asrar Ul Haq Majaz

जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है
मगर वो आज भी बरहम नहीं है

बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना
तिरी ज़ुल्फ़ों का पेच-ओ-ख़म नहीं है

बहुत कुछ और भी है इस जहाँ में
ये दुनिया महज़ ग़म ही ग़म नहीं है

तक़ाज़े क्यूँँ करूँँ पैहम न साक़ी
किसे याँ फ़िक्र-ए-बेश-ओ-कम नहीं है

उधर मश्कूक है मेरी सदाक़त
इधर भी बद-गुमानी कम नहीं है

मिरी बर्बादियों का हम-नशीनो
तुम्हें क्या ख़ुद मुझे भी ग़म नहीं है

अभी बज़्म-ए-तरब से क्या उठूँ मैं
अभी तो आँख भी पुर-नम नहीं है

ब-ईं सैल-ए-ग़म ओ सैल-ए-हवादिस
मिरा सर है कि अब भी ख़म नहीं है

'मजाज़' इक बादा-कश तो है यक़ीनन
जो हम सुनते थे वो आलम नहीं है

  - Asrar Ul Haq Majaz

Udasi Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Asrar Ul Haq Majaz

As you were reading Shayari by Asrar Ul Haq Majaz

Similar Writers

our suggestion based on Asrar Ul Haq Majaz

Similar Moods

As you were reading Udasi Shayari Shayari