Zafar Iqbal

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    मुझे ख़राब किया उस ने हाँ किया होगा
    उसी से पूछिए मुझ को ख़बर ज़ियादा नहीं

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    वो क़हर था कि रात का पत्थर पिघल पड़ा
    क्या आतिशीं गुलाब खिला आसमान पर

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    सफ़र पीछे की जानिब है क़दम आगे है मेरा
    मैं बूढ़ा होता जाता हूँ जवाँ होने की ख़ातिर

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    मौत के साथ हुई है मिरी शादी सो 'ज़फ़र'
    उम्र के आख़िरी लम्हात में दूल्हा हुआ मैं

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    तुझ को मेरी न मुझे तेरी ख़बर जाएगी
    ईद अब के भी दबे पाँव गुज़र जाएगी

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    ख़ुदा को मान कि तुझ लब के चूमने के सिवा
    कोई इलाज नहीं आज की उदासी का

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    अब के इस बज़्म में कुछ अपना पता भी देना
    पाँव पर पाँव जो रखना तो दबा भी देना

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    जो यहां ख़ुद ही लगा रक्खी है चारों जानिब
    एक दिन हम ने इसी आग में जल जाना है

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    थकना भी लाज़मी था कुछ काम करते करते
    कुछ और थक गया हूँ आराम करते करते

    अंदर सब आ गया है बाहर का भी अंधेरा
    ख़ुद रात हो गया हूँ मैं शाम करते करते

    ये उम्र थी ही ऐसी जैसी गुज़ार दी है
    बदनाम होते होते बदनाम करते करते

    फँसता नहीं परिंदा है भी इसी फ़ज़ा में
    तंग आ गया हूँ दिल को यूँ दाम करते करते

    कुछ बे-ख़बर नहीं थे जो जानते हैं मुझ को
    मैं कूच कर रहा था बिसराम करते करते

    सर से गुज़र गया है पानी तो ज़ोर करता
    सब रोक रुकते रुकते सब थाम करते करते

    किस के तवाफ़ में थे और ये दिन आ गए हैं
    क्या ख़ाक थी कि जिस को एहराम करते करते

    जिस मोड़ से चले थे पहुँचे हैं फिर वहीं पर
    इक राएगाँ सफ़र को अंजाम करते करते

    आख़िर 'ज़फ़र' हुआ हूँ मंज़र से ख़ुद ही ग़ाएब
    उस्लूब-ए-ख़ास अपना मैं आम करते करते

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    थकना भी लाज़मी था कुछ काम करते करते
    कुछ और थक गया हूँ आराम करते करते

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